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सूफ़ी कहावत
ज़माना बा तू नासाज़द, तू बा ज़माना साज़।
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वाचिक परंपरा
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सूफ़ी लेख
क़व्वाली के इब्तिदाई साज़, राग ताल और ठेके
क़व्वाली के इब्तिदाई साज़ों की तफ़्सील किसी एक मज़मून या किताब से दस्तयाब नहीं होती, अलबत्ता
अकमल हैदराबादी
ग़ज़ल
रह-ए-इश्क़ में ये सितम रहे फ़क़त एक मुश्त-ए-ग़ुबार परकभी खाल खींची गई मिरी तो चढ़ा दिया दार पर
अज़ीज़ वारसी देहलवी
ग़ज़ल
सितम की मश्क़ हम अहल-ए-जुनूँ पर जिस क़दर होगीमोहब्बत और भी दिल में हमारे जल्वा-गर होगी
नादिम बल्ख़ी
कलाम
रहम है जिस के सितम में वो सितम-गर और हैहै वफ़ा जिस की जफ़ा में वो जफ़ा गर और है
तसद्दुक़ अ’ली असद
ग़ज़ल
उस मस्त-नज़र का उफ़ रे सितम जिस वक़्त इधर हो जाती हैमजरूह जिगर हो जाता है बेताब नज़र हो जाती है
अज़ीज़ वारसी देहलवी
सूफ़ी कहावत
रहम आवर्दन बर बदां सितम अस्त बर नेकां
बुरे लोगों पर दया करना अच्छों पर अन्याय करने के बराबर होता है
वाचिक परंपरा
ग़ज़ल
न अदा मुझ से हुआ उस सितम-ईजाद का हक़मेरी गर्दन पे रहा ख़ंजर-ए-बेदाद का हक़
