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आमदः ब-क़त्ल-ए-मन आँ शोख़ सितम-गारे

मुनीर

आमदः ब-क़त्ल-ए-मन आँ शोख़ सितम-गारे

मुनीर

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    रोचक तथ्य

    حاجی محبوب خاں قوال نے اس غزل کے مقطع میں "منیر" تخلص استعمال کیا ہے، اگرچہ یہ غزل عموماً حضرت امیر خسروؔ سے منسوب کی جاتی ہے، تادمِ تحریر اس کی کوئی مستند اور قابلِ اعتماد سند دستیاب نہیں ہو سکی، اس بنا پر قرینِ احتیاط یہی معلوم ہوتا ہے کہ اسے منیرؔ تخلص رکھنے والے کسی شاعر کی طرف منسوب کیا جائے۔

    आमदः ब-क़त्ल-ए-मन आँ शोख़ सितम-गारे

    ईं तुर्फ़ः-तमाशः-बीं ना-कर्दः गुनह-गारे

    वो शोख़ सितमगर मेरे क़त्ल पर आमादा है

    देखो ये कैसा तमाशा है कि एक बेक़ुसूर को क़त्ल करता है

    गर नाम-ओ-निशान-ए-मन पुर्सद तु ब-गो क़ासिद

    आवारः-ओ-मज्नूने रुस्वा सर-ए-बाज़ारे

    अगर वो मेरा नाम और पता पूछे तो क़ासिद कह देना

    कि वो सर-ए-बाज़ार एक आवारा, मज़नून रूस्वा है

    'ईसा-ए-बीमाराँ अज़ हिज्र-ए-तु रंजूरम

    शायद ख़बर दारी अज़ हालत-ए-बीमारे

    बीमारों के मसीहा, मैं तुम्हारे हिज्र में रंजीदा हूँ

    शायद तुम बीमार के हाल से बेख़बर हो

    ख़्वाही कि शिफ़ा बाशद बीमार-ए-मोहब्बत रा

    यक जुर्'आ ख़ुदा रा देह अज़ शर्बत-ए-दीदारे

    अगर तुम बीमार-ए-मोहब्बत को सेहतयाब देखना चाहते हो तो

    ख़ुदा के लिए शर्बत-ए-दीदार का एक घूँट दे दो

    अज़ कूचः-ए-मा'शूक़ाँ बाज़ 'मुनीर' आयद

    सर ब-कफ़-ओ-जाँ बर-लब दिलदार ब-'अय्यारे

    महबूब की गली में मुनीर इस तरह बन-संवर कर आया है

    कि सर हाथ में है, जान लबों पर है और वो चालाक दिलबर है

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    हाजी महबूब अ'ली

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