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कविता
गान- अधरन की लाली कहुँ कहुँ बन रही, मानो जरी लाल चूनी।
अधरन की लाली कहुँ कहुँ बन रही, मानो जरी लाल चूनी।पिया के मिलावे को आवत कर दरपन ले,
शाह सिंकदर जुल्फ़िक़ार
सूफ़ी उद्धरण
जलन एक आग है, जो नेकियों को राख कर देती है।
जलन एक आग है, जो नेकियों को राख कर देती है।
शाह सिकंदर क़ादरी कैथली
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सूफ़ी उद्धरण
मख़लूक के कँधों पर बोझ न बनो, क्योंकि ख़ुदा ऐसे लोगों को दोस्त नहीं बनाता और ये बुरी आदत यक़ीन में रुकावट भी बनती है।
शाह सिकंदर क़ादरी कैथली
सूफ़ी उद्धरण
दरवेश वो है, जो न तो दुनियावी चीज़ों की तरफ़ माइल हो और न ही आसमानी चीज़ों की ओर, क्योंकि ये चीज़ें उस के दिल से कोई संबंध नहीं रखतीं।
शाह सिकंदर क़ादरी कैथली
ना'त-ओ-मनक़बत
क़िस्मत का सिकंदर हूँ मुक़द्दर का धनी हूँमैं पंजतनी पंजतनी पंजतनी हूँ






