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शाह नसीर
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कलाम
ऐ जान-ए-जहाँ कब तक ये गोशा-ए-तन्हाईसब दीद के तालिब हैं जितने हैं तमाशाई
मौलाना अब्दुल क़दीर सिद्दीक़ी
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जला हूँ आतिश-ए-फ़ुर्क़त से मैं ऐ शोअ'ला-रू याँ तकचराग़-ए-ख़ाना मुझ को देख कर हर शाम जलता है
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
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सूफ़ी लेख
मयार समाअ बतदरीज क़व्वाली के अहद-ए-ईजाद तक
समा’अ दूसरी सदी हिज्री की ईजाद है। हज़रत जुनैद बग़्दादी ने उसे तीसरी सदी हिज्री में
अकमल हैदराबादी
पद
ऐ 'दिलदार' कहाँ तक अपना दुख और दर्द सुनाओगे
ऐ 'दिलदार' कहाँ तक अपना दुख और दर्द सुनाओगेराग मलार ग़मों का अपने कहाँ तलक के गाओगे
कवि दिलदार
सूफ़ी उद्धरण
इंसान की ज़िंदगी का असली मक़सद "महबूब-ए-हक़ीक़ी" (ख़ुदा) तक पहुँचना है और अपनी हस्ती को उस में बिल्कुल मिला देना है, ये काम बड़ा कठिन है।
शाह अब्दुल लतीफ़ भिटाई
ना'त-ओ-मनक़बत
मक़ाम-ए-क़ुर्ब तक वो मज़हर-ए-नूर-ए-ख़ुदा पहुँचेनज़र इंसाँ की क्या पहुँचे जहाँ पर मुस्तफ़ा पहुँचे
हाफ़िज़ मालेगाँवी
ग़ज़ल
राज़-ए-सर-बस्ता मोहब्बत के ज़बाँ तक पहुँचेबात बढ़ कर ये ख़ुदा जाने कहाँ तक पहुँचे
