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कलाम
फँसा जब से दिल-ए-शैदा सनम की ज़ुल्फ़-ए-पेचाँ मेंबसर होती है हर शब एक ही ख़्वाब-ए-परेशाँ में
सय्यद अली केथ्ली
ग़ज़ल
तू ने जो की ऐ जान-ए-महफ़िल जाने की तय्यारी रातशम्अ' ने फिर सूली पर काटी रोते रोते सारी रात
शाह नसीर
पद
ब्रजभाव के पद - प्रीत निभाना रे काना प्रीत निभाना ए-जी म्हाँने बिसर नहि जाना
प्रीत निभाना रे काना प्रीत निभानाए-जी म्हाँने बिसर नहि जाना
मीराबाई
ग़ज़ल
ख़लील सफ़ीपुरी
ग़ज़ल
दिल यहाँ भी मुब्तला-ए-ज़ुल्फ़-ए-पेचाँ हो गयाख़ान:-ए-अहबाब भी 'औघट' को ज़िंदाँ हो गया
औघट शाह वारसी
शबद
मिश्रित का अंग - ऐ प्रभु मैं कछु जानि न पायो
ऐ प्रभु मैं कछु जानि न पायोइहाँ तो पठयो मोहिं कौलि करि वह सुधि मैं बिसरायो
जगजीवन साहेब
सलोक
फ़रीदा जे मैं पुछां हंस के सो मैं पूछन रोइ
फ़रीदा जे मैं पुछां हंस के सो मैं पूछन रोइजग सभोयी ढूँढियां डुक्खाँ बाझु न कोइ
