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ना'त-ओ-मनक़बत
रब्ब-ए-क़ादिर मुक़्तदिर की क़ुदरतें उन को नसीबजा-निशीनी नबी की शौकतें उन को नसीब
सय्यद फ़ैज़ान वारसी
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सूफ़ी कहावत
दोस्तां दर ज़िंदाँ बकार आयंद कि बर सुफ़रा दुश्मनां हम दोस्त नुमायंद
क़ैद में तो दोस्त ही मददगार साबित होते हैं, क्योंकि दस्तरख़्वान पर तो दुश्मन भी दोस्त लगते हैं।
वाचिक परंपरा
ग़ज़ल
चैन से रहने न दे गा इज़्तिराब-ए-दिल मुझेवर्ना फ़ुर्क़त में भी जी लेना न था मुश्किल मुझे
अख़्तर नासेह नसीब
कलाम
'अजब क्या गर मुझे 'आलम ब-ईं वुस'अत भी ज़िंदाँ थामैं वहशी भी तो वो हूँ ला-मकाँ जिस का बयाबाँ था
ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मजज़ूब
कलाम
जिसे दीद तेरी नसीब हो वो नसीब क़ाबिल-ए-दीद हैकि शब-ए-बरात है रात उसे दिन उस के वास्ते 'ईद है
अश्क रामपुरी
कलाम
बनाई मुझ बे-नवा की बिगड़ी नसीब मेरा जगा दियातेरे करम के निसार तू ने मुझे भी जीना सिखा दिया
अज्ञात
कलाम
मुझे क्या क़रार नसीब हो मेरी आज तक तलबी नहींमैं हनूज़ तिश्ना-ए-दीद हूँ जो लगी हुई है बुझी नहीं
अज्ञात
कलाम
बनाई मुझ बे-नवा की बिगड़ी नसीब मेरा जगा दियातिरे करम के निसार तू ने मुझे भी जीना सिखा दिया
फ़ना बुलंदशहरी
ना'त-ओ-मनक़बत
दुख़्तर-ए-इस्लाम पाकीज़ा नसब ज़ैनब में हैइस लिए लम्हात-ए-ग़म में भी तरब ज़ैनब में है
डॉ. मंसूर फ़रीदी
ना'त-ओ-मनक़बत
नूर-ए-अहमद की ज़िया आली नसब ज़ैनब में हैजज़्बा-ए-शेर-ए-ख़ुदा फ़ख़्र-ए-’अरब ज़ैनब में है
महमूद अहमद रब्बानी
ना'त-ओ-मनक़बत
निसाब-ए-हक़ है यक़ीनन तिरा निसाब मुई'नपढ़ा है जिस ने तुझे वो है कामयाब मुई'न

