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फ़ारसी सूफ़ी काव्य
हस्त अज़ उ'म्र-ए-ख़िज़्र तूल-ए-शब-ए-हिज्रम दराज़सायः अफ़्गंद: बर ऊ ज़ुल्फ़-ए-परेशान-ए-शुमा
शाह अकबर दानापूरी
ना'त-ओ-मनक़बत
ख़याल-ए-आख़िरत से हूँ परेशाँ या रसूल-अल्लाहउठाऊँगा मैं कैसे बार-ए-’इस्याँ या रसूल-अल्लाह
अब्दुल हादी काविश
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ना'त-ओ-मनक़बत
तुम्हारी ज़ुल्फ़ से है सिलसिला ग़रीब-नवाज़असीर-ए-दाम-ए-मोहब्बत हूँ या ग़रीब-नवाज़
निसार अकबराबादी
शे'र
तुम अपनी ज़ुल्फ़ खोलो फिर दिल-ए-पुर-दाग़ चमकेगाअंधेरा हो तो कुछ कुछ शम्अ' की आँखों में नूर आए
मुज़तर ख़ैराबादी
शे'र
क्यों गुल-ए-आरिज़ पे तुमने ज़ुल्फ़ बिखराई नहींचश्मा-ए-ख़ुर्शीद में क्यों साँप लहराया नहीं
मिर्ज़ा फ़िदा अली शाह मनन
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
ज़ुल्फ़ आशुफ़्तः-ओ-ख़ूए-कर्दः-ओ-ख़ंदँ-लब-ओ-मस्तपैरहन चाक-ओ-ग़ज़ल-ख़्वान-ओ-सुराही दर दस्त
हाफ़िज़
ग़ज़ल
है बला-ए-ना-गहाँ अल्लाह क्या आज़ार-ए-ज़ुल्फ़देखते ही देखते दिल हो गया बीमार-ए-ज़ुल्फ़
अब्दुल्लाह बेदिल
शे'र
दिल फंसा कर ज़ुल्फ़ में ख़ुद है पशेमानी मुझेदह्र में ख़ल्क़-ए-ख़ुदा कहती है ज़िंदानी मुझे
