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कुछ ख़बर है तुझ को ऐ आसूद:-ए-ख़्वाब-ए-लहदशब जो तेरी याद में हम ता-सहर रोया किए
बने पंखुड़ी नक़्श-ए-पा कब लहद परतुझे ऐ सबा गुल कतरना न आया
फ़रिश्ते क्यूँ सताते हैं लहद मेंख़ुदा मालिक है जो चाहे सज़ा दे
ये दिल की तड़प क्या लहद को हिलातीतुम्हें क़ब्र पर पाँव धरना न आया
ऐ 'अर्श' आओ ख़ाक में दिल्ली के सो रहेंमिट कर भी ख़्वाब-गाह ये अहल-ए-हुनर की है
मैं फ़िदा-ए-मुर्शिद-ए-पाक हूँ दर-ए-बारगाह की ख़ाक हूँवो समा के मुझ में ये कहते हैं कि 'अज़ीज़' ग़ैर-मुहाल है
मिल चुके अब मिलने वाले ख़ाक केक़ब्र पर जा जा के रोया कीजिए
पाएँगे भला ख़ाक तिरी चश्म को आहूचीते भी ख़िजालत से छुपाते हैं कमर आज
नज़र-अफ़ज़ोई-ए-शम-ए-तजल्ली ऐ ज़हे-क़िस्मतकहाँ बज़्म-ए-जमाल उन की कहाँ परवानगी अपनी
ऐ शम-ए-दिल-अफ़रोज़ शब-तार-मोहब्बततुझ से ही है ये गर्मी-ए-बाज़ार-ए-मोहब्बत
दिखा मुझ को दीदार ऐ गुल-एज़ारतुझे अपने बाग़-ए-इरम की क़सम
ऐ शब-ए-फ़ुर्क़त न आई तुझ को शर्मग़ैर के घर जा के मुँह काला किया
ऐ असीरान-ए-क़फ़स आने को है फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँचार-दिन में और गुलशन की हवा हो जाएगी
ऐ बहार-ए-गुलशन-ए-नाज़-ओ-नज़ाकत हर तरफ़तेरे आने से हुई है और भी बुस्ताँ में धूम
सदक़े ऐ क़ातिल तिरे मुझ तिश्ना-ए-दीदार कीतिश्नगी जाती रही आब-ए-दम-ए-शमशीर से
मुरीद-ए-पीर-ए-मय-ख़ाना हुए क़िस्मत से ऐ नासेहन झाड़ें शौक़ में पलकों से हम क्यूँ सहन-ए-मय-ख़ाना
ऐ ज़ब्त-ए-दिल ये कैसी क़यामत गुज़र गईदीवानगी में चाक गरेबान हो गया
देख ऐ चमन-ए-हुस्न तुझे बाग़ में ख़ंदाँशबनम नहीं ये गुल पे ख़जालत से अरक़ है
न छुप मुझ से तू ऐ बुत-ए-संग-दिलतुझे इस किताब और क़लम की क़सम
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