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महफ़िल इ’श्क़ में जो यार उठे और बैठेहै वो मलका कि सुबुक-बार उठे और बैठे
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
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इजाज़त हो तो हम इस शम्अ'-ए-महफ़िल को बुझा डालेंतुम्हारे सामने ये रौशनी अच्छी नहीं लगती
पुरनम इलाहाबादी
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बहार आई है गुलशन में वही फिर रंग-ए-महफ़िल हैकिसी जा ख़ंदा-ए-गुल है कहीं शोर-ए-अ’नादिल है
शम्स फ़िरंगी महल्ली
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बहार आई है गुलशन में वही फिर रंग-ए-महफ़िल हैकिसी जा ख़ंदा-ए-गुल है कहीं शोर-ए-अ’नादिल है
शम्स फ़िरंगी महल्ली
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उजाला हो तो ढूँडूँ दिल भी परवानों की लाशों मेंमिरी बर्बादियों को इंतिज़ार-ए-सुब्ह-ए-महफ़िल है
सीमाब अकबराबादी
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शम्अ' के जल्वे भी या-रब क्या ख़्वाब था जलने वालों कासुब्ह जो देखा महफ़िल में परवाना ही परवाना था
बेदार शाह वारसी
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हाल-ए-दिल है कोई ख़्वाब-आवर फ़साना तो नहींनींद अभी से तुम को ऐ यारान-ए-महफ़िल आ गई