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शे'र
तेरे नैन-ए-पुर-ख़ुमार कूँ सरमस्त-ए-बादा-नाज़या बे-ख़ुदी का जाम या सहर-ए-बला कहूँ
क़ादिर बख़्श बेदिल
शे'र
तुम अपनी ज़ुल्फ़ खोलो फिर दिल-ए-पुर-दाग़ चमकेगाअंधेरा हो तो कुछ कुछ शम्अ' की आँखों में नूर आए
मुज़तर ख़ैराबादी
शे'र
असीर-ए-गेसू-ए-पुर-ख़म बनाए पहले आशिक़ कोनिकाले फिर वो पेच-ओ-ख़म कभी कुछ है कभी कुछ है
अब्दुल हादी काविश
शे'र
अज़ीज़ वारसी देहलवी
शे'र
मुज़तर ख़ैराबादी
शे'र
मेरी सुंदरता के गहने छीन के वो कहता है मुझ सेवो इंसान बहुत अच्छा है जो हर-हाल में ख़ुश रहता है
वासिफ़ अली वासिफ़
शे'र
तुम को कहते हैं कि आशिक़ की फ़ुग़ाँ सुनते होये तो कहने ही की बातें हैं कहाँ सुनते हो