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शे'र
मैं वो साफ़ ही न कह दूँ जो है फ़र्क़ मुझ में तुझ मेंतिरा दर्द दर्द-ए-तन्हा मिरा ग़म ग़म-ए-ज़माना
जिगर मुरादाबादी
शे'र
हर अदा नाज़ में है नोक-चौक उस के 'फ़िराक़'खुब गई जी में हमारे यार की बाँकी तरह
हकीम सनाउल्लाह ख़ान
शे'र
शोमी-ए-क़िस्मत कहें या ख़सलत-ए-इंसाँ इसेआ के क़ाबिज़ बज़्म-ए-हस्ती पर ये मेहमाँ हो गया
गुरबचन सिंह दयाल
शे'र
इजाज़त हो तो हम इस शम्अ'-ए-महफ़िल को बुझा डालेंतुम्हारे सामने ये रौशनी अच्छी नहीं लगती
पुरनम इलाहाबादी
शे'र
फ़ना बुलंदशहरी
शे'र
शम्अ' के जल्वे भी या-रब क्या ख़्वाब था जलने वालों कासुब्ह जो देखा महफ़िल में परवाना ही परवाना था
बेदार शाह वारसी
शे'र
ख़ुदा शाहिद है इस शम्‘अ-ए-फ़रौज़ाँ की ज़िया तुम होमैं हरगिज़ ये नहीं कहता तुमहें मेरे ख़ुदा तुम हो
शाह तक़ी राज़ बरेलवी
शे'र
जल ही गया फ़िराक़ तू आतिश से हिज्र कीआँखों में मिरी रह न सका यारो इंतिज़ार