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कलाम
न ले जिंस-ए-मोहब्बत दे के दिल बाज़ार-ए-उल्फ़त मेंये सौदा बेच देगा ‘रिंद’ ये बेवपार जाने दे
रिंद लखनवी
कलाम
वफ़ूर-ए-रहमत-ए-बारी है मय-ख़्वारों पे इन रोज़ोंजिधर से अब्र उठता है सू-ए-मय-ख़ाना आता है
अमीर मीनाई
कलाम
आप अपनी आँख से आकर किसी दिन देख लेंअब्र-ए-नैसाँ की तरह बरसात बरसाता हूँ मैं