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कुछ आप ही आप वहशत में दिल दीवाना आता हैमुझे जिस दम ख़याल-ए-नर्गिस-ए-मस्ताना आता है
फ़स्ल-ए-गुल आई है फिर वहशत सिवा होने को हैपुर्ज़े-पुर्ज़े जिस्म पर मेरे क़बा होने को है
दिन में वहशत बहल गईरात हुई और निकला चाँद
सलामत अगर जोश-ए-वहशत यही हैतो घर ही किसी दिन बयाबान होगा
तुझे वहशत है सहरा-ए-जुनूँ क्यूँ मेरे शेवन से'इरफ़ान तराज़े महमूद अयाज़े
दिल के वहशत-सरा से ख़ुदा जाने क्यूँसब गए एक दाग़-ए-वफ़ा रह गया
कोई और नहीं आ-कर अंजीर मिला जातेऐ काश मिरी वहशत वो और बढ़ा जाते
'संजर' को ख़ैर अपनी कुछ भी नहीं वहशत हैंउल्फ़त ने उसे ऐसा दीवान: बना डाला
है वहशत-ए-तबीअत-ए-ईजाद यास-खेज़ये दर्द वो नहीं कि न पैदा करे कोई
बदाम आवुर्दनश सय्याद-ए-मन आसाँ नमी बाशददिल-ए-दीवानः-ए-आँ चश्म-ए-वह्शत आफ़रीं दारम
वहशत को मिरी साथ मिरे दफ़्न न करनाघर ख़ाना-ख़राबी का मिरे घर से जुदा हो
कूचा-ए-यार में भी दिल नहीं लगता ऐ 'दाग़'देखिए जाएगी किस रोज़ ये वहशत तेरी
वहशत-ए-आतिश-ए-दिल से शब-ए-तन्हाई मेंसूरत-ए-दूद रहा साया गुरेज़ाँ मुझ से
वहशत-ए-ख़्वाब-ए-अदम शोर-ए-तमाशा है 'असद'जो मज़ा जौहर नहीं आईना-ए-ताबीर का
जोश-ए-वहशत में मुझे क़ैदी-ए-ज़िंदाँ न करोसैल हूँ तोड़ के दीवार निकल जाऊँगा
वो बे-कसी है कि वहशत के नाग डसते हैंग़रीब ऐसे में कोई जिया जिया न जिया
पतिंगों की तरह उड़ने लगीं चिंगारियाँ दिल कीख़ुदा जाने कहाँ ले जाएगी वहशत मेरे दिल की
कुछ रोज़ अभी सब्र कर ऐ पंजा-ए-वहशतबे-मौसम-ए-गुल लुत्फ़ नहीं जामा-दरी का
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