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कलाम
जंगल दे विच शेर मरेला बाज़ पवे विच घर दे हूइश्क़ जिन्हाँ सर्राफ़ न कोई खोट न छड्डे ज़र दे हू
सुल्तान बाहू
कलाम
पीर नसीरुद्दीन नसीर
कलाम
दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यूँरोएँगे हम हज़ार बार कोई हमें सताए क्यूँ
मिर्ज़ा ग़ालिब
कलाम
सहबा अकबराबादी
कलाम
माहिरउल क़ादरी
कलाम
ओ दिल तोड़ के जाने वाले दिल दिल बात बात बताता जाअब मैं दिल को क्या समझाऊँ मुझ को भी समझाता जा
हफ़ीज़ जालंधरी
कलाम
क्या कहें मिल्लत-ओ-दीं कुफ़्र है ईमाँ अपनापेश-ए-बुत-ए-सज्दा है और दैर है ऐवाँ अपना
तसद्दुक़ अ’ली असद
कलाम
ओ सनम तेरे न आने की क़सम खाता हूँ मैंइस दिल-ए-बेताब को दिन-रात समझाता हूँ मैं