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कलाम
न असीर-ए-क़ैद-ए-सुजूद में न रहीन-ए-जौर-ए-वुजूद मेंकि ये आ'शिक़ों की नमाज़ है न सुजूद है न क़ियाम है
कौसर आरफ़ी
कलाम
गो देख चुका हूँ पहले भी नज़्ज़ारा दरिया-नोशी काएक और सला-ए-आम कि साक़ी रात गुज़रने वाली है
क़तील शिफ़ाई
कलाम
गुलिस्तान-ए-दाग़-ए-दिल में है ख़याल-ए-ज़ुल्फ़-ए-यारसहन में गुलज़ार के सुम्बुल का होना चाहिए
ख़्वाजा नासिरुद्दीन चिश्ती
कलाम
सर को न कटवाता गर रम्ज़-ए-फ़ना को जानताकब कमाल-ए-'इश्क़ में मंसूर तो होशियार है
तसद्दुक़ अ’ली असद
कलाम
कहाँ वो जमाल-ए-जहाँ-नुमा कहाँ एक ज़र्रा-ए-बे-बसरउसे कौन नूर-ए-सहर कहे न छुपे जो ज़ुल्मत-ए-शाम से
मख़मूर देहलवी
कलाम
इलाही रौज़ा-ए-ख़ैरुल-वरा पर जल्द जा पहुँचूँब-रंग-ए-गर्दिश-ए-गर्दूं ये गर्दिश मुझ को सरसर दे
अलाउद्दीन जलाली
कलाम
इलाही 'अब्र' की क़िस्मत हमेशा वस्ल-ए-मुर्शिद होसदफ़ में बहर-ए-वहदत के मुझे दुर्दाना तू कर दे
अज्ञात
कलाम
शक्ल-ए-अहमद है हक़ीक़त में अहद की सूरतपर्दा-ए-मीम पड़ा था मुझे मा'लूम न था
शाह फ़िदा हुसैन फ़य्याज़ी
कलाम
बस उसी ख़ता पे मिरे लिए मय-ए-ला-ला-गूँ है न जाम हैकि गदाई दर-ए-मय-कदा मरी तिश्नगी पे हराम है
इक़बाल सफ़ीपुरी
कलाम
हैं कहाँ दारा सिकंदर जम कहाँ 'वारिस' 'अलीइक फ़क़त है नाम बाक़ी और निशाँ कुछ भी नहीं