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कलाम
फ़ना जब मेरी हस्ती हो गई ऐ'न-ए-हक़ीक़त मेंतो उस यकता के जल्वे मिल गए ख़ुद मेरी हस्ती में
ख़ादिम हसन अजमेरी
कलाम
चश्म-ए-मजनूँ के लिए दीदार-ए-लैला हर जगहवर्ना ग़ैरों के लिए सद पर्दा-ए-महमिल में है
ख़्वाजा हमीदुद्दीन अहमद
कलाम
ख़ुदी के साज़ में है उ'म्र-ए-जावेदाँ का सुराग़ख़ुदी के सोज़ से रौशन हैं उम्मतों के चराग़
अल्लामा इक़बाल
कलाम
हया बदायूँनी
कलाम
'माहिर' है इस के सामने का'बा भी सज्दा रेज़जो दिल है अ'क्स-ए-गुंबद-ए-ख़िज़्रा लिए हुए
माहिरउल क़ादरी
कलाम
शुक्र सद शुक्र इस हसीं के नूर से रौशन है दिलशम्अ-ए-रुख़ पर जिस के जिब्रईल-ए-अमीं परवाना था