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कलाम
कहो बुलबुल से ले जावे चमन से आशियाँ अपनापढ़े गर सद हज़ार अफ़्सूँ न होगा बाग़बाँ अपना
शाह आलम सानी
कलाम
किसी से सीख ले बुलबुल सरापा दास्ताँ रहनाहै नंग-ए-'इश्क़ हाल-ए-दिल का मोहताज-ए-बयाँ रहना
ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मजज़ूब
कलाम
उन्हीं ख़ुश-गुमानियों में कहीं जाँ से भी न जाओवो जो चारा-गर नहीं है उसे ज़ख़्म क्यूँ दिखाओ
अज्ञात
कलाम
इन्ही ख़ुश-गुमानियों में कहीं जाँ से भी न जाओवो जो चारागर नहीं है उसे ज़ख़्म क्यूँ दिखाओ
अहमद फ़राज़
कलाम
बीत गया हंगाम-ए-क़यामत रोज़-ए-क़यामत आज भी हैतर्क-ए-तअल्लुक़ काम न आया उन से मोहब्बत आज भी है