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कलाम
पै-ता'ज़ीम उठती है क़ियामत कू-ए-जानाँ मेंअजल कहती है बिस्मिल्लाह जहाँ वो पाँव धरते हैं
दाग़ देहलवी
कलाम
उन ने कहा ये मुझ से अब छोड़ दुख़्त-ए-रज़ कोपीरी में ऐ दिवाने ये कौन मस्तियाँ हैं
मोहम्मद रफ़ी सौदा
कलाम
शुक्र सद शुक्र इस हसीं के नूर से रौशन है दिलशम्अ-ए-रुख़ पर जिस के जिब्रईल-ए-अमीं परवाना था
अमीर मीनाई
कलाम
तालिब-ए-वस्ल-ए-यार हूँ शौक़-ए-जिगर को क्या करूँहिज्र से बे-क़रार हूँ सूद-ओ-ज़रर को क्या करूँ
अज्ञात
कलाम
मुर्शिद है शाहबाज़ इलाही रलया संग हबीबाँ हूतक़दीर इलाही छिक्कियां डोराँ मिलसी नाल नसीबाँ हू
सुल्तान बाहू
कलाम
अगर मंज़ूर है पीना मय-ए-वहदत के साग़र कालिया कर नाम हर दम हज़रत साक़ी-ए-कौसर का
ख़्वाजा इलाही बख़्श मारूफ़
कलाम
ऐ जान-ए-जहाँ कब तक ये गोशा-ए-तन्हाईसब दीद के तालिब हैं जितने हैं तमाशाई
मौलाना अब्दुल क़दीर सिद्दीक़ी
कलाम
मंबा’-ए-नूर-ए-ज़ात है जल्वा-गर सिफ़ात हैतालिब-ए-हक़ बिया-बिया ख़ाक-ए-रह-ए-हिजाज़ बन
शाह मोहसिन दानापुरी
कलाम
अमीर बख़्श साबरी
कलाम
क्यूँ हूक सी उठती है दिल-ए-ज़ार में 'ताहिर'इस हस्त-ए-वीराँ के ख़स-ओ-ख़ाशाक जला दे
डॉ. ताहिर-उल-क़ादरी
कलाम
शाह महमूदुल हसन
कलाम
पता कब था मुझे उस का कि मैं भी रिंद-ओ-साक़ी हूँख़बर उस की न थी मुझ को शराब-ए-अर्ग़वाँ मैं हूँ