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शाम-ए-ग़म फ़िराक़ भी कितनी 'अजीब हैमा'लूम हो रहा है क़ियामत क़रीब है
वो फ़िराक़ और वो विसाल कहाँवो शब-ओ-रोज़-ओ-माह-ओ-साल कहाँ
मिरी ज़िंदगी तो फ़िराक़ है वो अज़ल से दिल में मकीं सहीवो निगाह-ए-शौक़ से दूर हैं रग-ए-जाँ से लाख क़रीं सही
शब-ए-फ़िराक़ की यारो कोई सहर भी हैहमारे हाल की उन को कोई ख़बर भी है
उस तेरे सर की क़सम फ़र्क़ सर-ए-मू भी नहींजिस क़दर हम हैं परेशाँ तिरे गेसू भी नहीं
जिसे लोग कहते हैं तीरगी वही शब हिजाब-ए-सहर भी हैजिन्हें बे-ख़ुदी फ़ना मिली उन्हें ज़िंदगी की ख़बर भी है
फ़िराक़-ए-जानाँ में हम ने साक़ी लहू पिया है शराब कर केतप-ए-अलम ने जिगर जो भूना तो हम ने खाया कबाब कर के
वस्ल-ओ-फ़िराक़-ए-यार का क़िस्सा 'अजीब हैजितना मैं उस से दूर वो उतना क़रीब है
मैनूँ तेरे फ़िराक़ ने मार सुटिया, आजा आजा ओ जान-ए-बहार आजाईहनाँ साहवाँ दा नहीं एतबार कोई, तीनों वेख् ते ला इक वार आजा
अपने हवास में शब-ए-ग़म कब हयात हैऐ दर्द-ए-हिज्र तू ही बता कितनी रात है
शाम-ए-फ़िराक़ अब न पूछ आई और आ के टल गईदिल था कि फिर बहल गया जाँ थी कि फिर सँभल गई
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