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कलाम
न हदीस मय की तलाश है न ग़रज़ हिकायत-ए-जाम सेतेरी इक नज़र ने बचा लिया मुझे गुमरही के मक़ाम से
मख़मूर देहलवी
कलाम
हम नहीफ़ों से गुरेज़ आप को दरकार नहींपहलू-ए-गुल में हुआ करते हैं क्या ख़ार नहीं
ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मजज़ूब
कलाम
अहल-ए-दुनिया की ग़रज़ लगती है जब दरवेश सेकहते हैं अपने हुसूल-ए-मुद्द’आ के वास्ते
शाह तुराब अली क़लंदर
कलाम
मैं नफ़ी इसबात से कुछ भी नहीं रखता ग़रज़जिस में मशग़ूल हूँ वो मश्ग़ला कुछ और है
तसद्दुक़ अ’ली असद
कलाम
हक़ीक़त तो बस इतनी है हक़ीक़त ख़ुद हक़ीक़त हैतअ'ज्जुब है उसे अहल-ए-ग़रज़ क्या क्या समझते हैं