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प्रीत का वा'दा कर के पिया क्यूँ प्रीत निभाना छोड़ दियावो मेहर की अँखियाँ फेर लईं और दम दम आना छोड़ दिया
यूँही जुदा-जुदा गर ऐ जान-ए-मन रहेगासरसब्ज़ किस तरह फिर दिल का चमन रहेगा
दिल उड़ा ग़ैर का आ'शिक़ का जिगर छोड़ दियातुम ने ऐ जान-ए-जहाँ तीर किधर छोड़ दिया
बाम पर नंगे न आओ तुम शब-ए-महताब मेंचाँदनी पड़ जाएगी मेला बदन हो जाएगा
अज़ मय-'इश्क़-ए-शाह-ए-सरमस्तमबंदा-ए-मुर्तज़ा 'अली हस्तम
दाग़-हाय दिल अगर मेरे बहारों पर रहेएक दिन सीना मेरा रश्क-ए-चमन हो जाएगा
दिल तो तुझ पे फ़िदा ऐ जान किए बैठे हैंजाम हम शौक़-ए-शहादत का पिए बैठे हैं
इक ज़माने के बा'द आई है शाम-ए-ग़म शाम-ए-ग़म मेरे घर से कहाँ जाएगीमेरी क़िस्मत में है जो तुम्हारी कमी वो कमी मेरे घर से कहँ जाएगी
दीवाना-ए-परी हूँ न शैदा हूँ हूर कापरवाना हूँ मैं शम'-ए-तजल्ली-ए-तूर का
फ़स्ल-ए-गुल है शराब पी लीजिएज़िद न कीजे जनाब पी लीजिए
ख़ताएँ बख़्श दे मेरी शह-ए-लौलाक के सदक़ेमेरे मालिक दुहाई है तुझे आल-ए-पयम्बर की
शहीद-ए-कर्बला-ए-नाज़ से होगी हमें ख़जलतकभी तीर-ए-निगाह से हम जो पहलू को बचाएँगे
जो बंदा-ए-जान-ए-जानाँ है तो जान जाने से क्या मतलबजो महव-ए-रू-ए-जाना है तो होश आने से क्या मतलब
हुस्न-ए-’उरूस-ए-दहर पे जो मर रहा हूँ मैंधोके में नफ़्स-ए-दूँ के मगर आ गया हूँ मैं
मुब्तला-ए-ग़म दिल-ए-नाकाम हैजी का आना मौत का पैग़ाम है
साज़-ए-हस्ती बजा रहा हूँ मैंचश्म-ए-मस्ती मना रहा हूँ मैं
हैरान हुआ हैरान हुआतुम सर-ए-हश्र मिलोगे ये सुना है जब से
क्या आँख उठा के जल्वा-ए-क़ुदरत को देखते'कौकब' फ़रेब-ख़ुर्दा-ए-चश्म-ए-बुताँ रहे
रोज़-ए-अज़ल से रोज़-ए-अबद तकज़िक्र-ए-क़लंदर होगा लहद तक
फ़ुर्क़त-ए-तैबा में ये मिस्कीन ग़िज़ा ठहरे मेरीरात-ओ-दिन अब लुक़मा-ए-अंदोह-ओ-ग़म खाते हैं हम
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