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कलाम
शकील बदायूँनी
कलाम
फिर चराग़-ए-लाला से रौशन हुए कोह-ओ-दमनमुझ को फिर नग़्मों पे उकसाने लगा मुर्ग़-ए-चमन
अल्लामा इक़बाल
कलाम
महफ़िल-ए-रिंदाँ में जाम मुल का होना चाहिएज़ोहद का क़ुल हो चुका क़ुलक़ुल का होना चाहिए
ख़्वाजा नासिरुद्दीन चिश्ती
कलाम
बा'द अज़ फ़ना मज़ार पे आने से फ़ाइदामरने से हम मिटे तो जलाने से फ़ाइदा
ख़्वाजा नासिरुद्दीन चिश्ती
कलाम
खुल गए ज़ख़्मों के मुँह क्या जाने क्या कहने को हैंक्या नमक-दान-ए-सितम को बे-मज़ा कहने को हैं