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कलाम
यार ख़ुद जल्वा-नुमा था मुझे मा'लूम न थाग़ुंचा-ओ-गुल में बसा था मुझे मा'लूम न था
शाह फ़िदा हुसैन फ़य्याज़ी
कलाम
हमें क्या ग़म क़ियामत में जो पुर्सिश होने वाली हैकि जब वो फ़ित्ना-गर आया तो फिर मैदान ख़ाली है
दाग़ देहलवी
कलाम
शक्ल आँखों में मिरी जल्वा-नुमा किस की हैपर्दा-ए-दिल से जो निकली ये सदा किस की है
मिर्ज़ा अश्क लखनवी
कलाम
कलमे लक्ख करोड़ां तारे वली कीते सै राहीं हूकलमे नाल बुझाए दोज़ख़ जिथ अग्ग बले अज़गाही हू