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कलाम
क्या हैं ये क्या नाज़ नख़रे उन बुतों के ज़ाहिदोजिस के मारे हम हैं वो नाज़-ए-हसीना और है
सुलतान अली
कलाम
'महमूद' शाह चल गुरु को मिलिए और मिलिए गुरु में हर कोहर रूठे तो गुरु मिलावै गुरु के पइयाँ पड़ा करो
सय्यद महमूद
कलाम
उस की ख़ुश्बू के जो ख़्वाहाँ थे क्यूँ न हुएतालिब-ए-बोसा-ए-रुख़ ज़ुल्फ़-ए-दोता क्यूँ न हुए
मुबारक हुसैन मुबारक
कलाम
हम तो हैं परदेस में देस में निकला होगा चाँदअपनी रात की छत पर कितना तन्हा होगा चाँद
राही मासूम रज़ा
कलाम
विलायत में तो हज़रत के नहीं है मुझ को शक हरगिज़व-लेकिन नाज़ अज़ बस था जनाब-ए-शैख़-ए-सनआँ में
सय्यद अली केथ्ली
कलाम
लेकर जहाँ के हुस्न को शम्स-ओ-क़मर को क्या करूँमुझ को तो तुम पसंद अपनी नज़र को क्या करूँ