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कलाम
वही कुछ दहर में राज़-ए-निज़ाम-ए-दिल समझते हैंजो तेरे इ'श्क़ को कौनैन का हासिल समझते हैं
माहिरउल क़ादरी
कलाम
याद उन की दिल में रहती है और हिज्र की रातें होती हैंआँखें यूँ झम-झम रोती हैं जैसे बरसातें होती हैं
रियाज़ सुहरावर्दी
कलाम
'अजब अंदाज़ तुझ को नर्गिस-ए-मस्ताना आता हैकि हर होशियार बनने को यहाँ दीवाना आता है
बाक़िर शाहजहांपुरी
कलाम
हर इक 'आशिक़ नए अंदाज़ से क़ुर्बान-ए-क़ातिल थाक़तील-ए-तेग़-ए-बे-सर था शहीद-ए-नाज़-ए-बे-दिल था
ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मजज़ूब
कलाम
जले आशियाने जो दिल की तरह चमन से शोर-ए-फ़ुग़ाँ उठाये कहाँ लगी ये कहाँ लगी कि क़फ़स से आज धुआँ उठा