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तुझ को जल्वा-गह-ए-नाज़ में रोका थामाहौसला देख लिया अपने तमाशाई का
बाक़ी है आधी रात मगर इस का क्या जवाबघबरा के वो ये कहते हैं वक़्त-ए-अज़ाँ है अब
यूँ न हो बर्क़-ए-तजल्ली बेताबमिल गया रँग तमाशाई का
'औघट' अब चुप साधिए कि बात न पहुँचे दूरलुटा बैठा वो नक़्द-ए-जाँ किसी की रू-नुमाई में
ज़माने में हैं यादगार-ए-ज़मानावफ़ाएँ हमारी जफ़ाएँ तुम्हारी
लग चली बाद-ए-सबा क्या किस मस्ताने सेझूमती आज चली आती है मय-ख़ाने से
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