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कलाम
तुम्हारी अंजुमन से उठ के दीवाने कहाँ जातेजो वाबस्ता हुए तुम से वो अफ़्साने कहाँ जाते
क़तील शिफ़ाई
कलाम
अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है रात जुदाई कीतुम क्या समझो तुम क्या जानो बात मिरी तन्हाई की
क़तील शिफ़ाई
कलाम
गाते हुए पेड़ों की ख़ुनुक छाँव से आगे निकल गएहम धूप में जलने को तिरे गाँव से आगे निकल गए
क़तील शिफ़ाई
कलाम
क़तील शिफ़ाई
कलाम
इक जाम खनकता जाम कि साक़ी रात गुज़रने वाली हैइक होश-रुबा इनआ'म कि साक़ी रात गुज़रने वाली है
क़तील शिफ़ाई
कलाम
उस का ज़िक्र है जारी हर एक साँस के अंदरये मसअला अब तो पहचानूँ क्या हो जिस्म के अंदर