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'इश्क़ के रंग में रंग जाएँ जब अफ़्कार तो खुलते हैं ग़ुलामों पे वो असरार कि रहते हैं वो तौसीफ़-ओ-सना-ए-शह-ए-अब्रार में हर लहज़ा गुहर-बारवर्ना वो सय्यद-ए-'आली-नसबी हाँ वही उम्मी-लक़बी हाशमी-ओ-मुत्तलबी-ओ-'अरबी-ओ-क़ुरशी-ओ-मदनी और कहाँ हम से गुनहगार
गेसुओं को चेहरे पर आप ने बिखेरा हैबादलों के साए में चाँद का बसेरा है
भुलाता लाख हूँ लेकिन बराबर याद आते हैंइलाही तर्क-ए-उल्फ़त पर वो क्यूँ कर याद आते हैं
रौशन जमाल-ए-यार से है अंजुमन तमामदहका हुआ है आतिश-ए-गुल से चमन तमाम
चुपके चुपके रात-दिन आँसू बहाना याद हैहम को अब तक आशिक़ी का वो ज़मानः याद है
निगाह-ए-यार जिसे आश्ना-ए-राज़ करेवो अपनी ख़ूबी-ए-क़िस्मत पे क्यूँ न नाज़ करे
बला-कशान-ए-ग़म-ए-इंतिज़ार हम भी हैंख़राब-ए-गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार हम भी हैं
सुनो ऐ मोमिनों रमज़ान 'अज़्मत का महीना हैयक़ीनन ख़ैर-ओ-बरकत और रहमत का महीना है
कैसे छुपाऊँ राज़-ए-ग़म दीदा-ए-तर को क्या करूँदिल की तपिश को क्या करूँ सोज़-ए-जिगर को क्या करूँ
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