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दिल सोज़ से ख़ाली है निगह पाक नहीं हैफिर इस में अजब क्या कि तू बेबाक नहीं है
पाक रखा पाक-दामन से हिसाबबू से भी गिन के दिए गिन के लिए
तय गुल वचों होर निकलीआलम देवच परघट होया
ब-रूह-ए-पाक शम्सुद्दीन तबरेज़ीकि कल सर
तेरे 'इश्क़ में डालूँ धमालतू है ’अता-ए-पाक शब्बीरी
सदक़ा-ए-मे’राज-ए-पाक-ए-मुस्तफ़ारंग दे मेरा सरापा रंग दे
मुझे इ'श्क़ ने फूँक के ख़ाक की तुझे हुस्न-ए-बे-लौस से पाक क्यातुझे पाक किया मुझे ख़ाक किया ये जो भेद है उस में बता दे मुझे
मेरी तौबा मेरी तौबामुझे कर दे मु'आफ़ अपने रसूल-ए-पाक के सदक़े
है बू गेसू-ए-पाक की रश्क-ए-’अंबरफ़ुज़ूँ 'इत्र से है पसीना तुम्हारा
हज़रत-ए-यूसुफ़ ने अच्छा गुल खिलाया मिस्र मेंचाक-दामानी से पैदा पाक-दामानी हुई
पाक दामानी में तेरी नहीं पड़ने का ख़ललअपने मुश्ताक़ों से नाहक़ है ये पर्दा तेरा
निगाह-ए-मस्त को मसरूफ़-ए-नाज़ रहने देकुछ और रोज़ मुझे पाक-बाज़ रहने दे
क़ुदरत वसीला है तुम्हें मा'बूद-ए-पाक का'साबिर' के दर को छोड़ के हरगिज़ न जाएँगे
मुहताज-ए-ख़राबाती या पाक नमाज़ी हैकुछ कर न नज़र उस पर वाँ नुक्ता-नवाज़ी है
क्यूँ पाक हम न होवें आलूदगी-ए-जाँ सेसाक़ी से पी लिया है जाम-ए-तुहूर तेरा
ख़ाक हूँ पाक हूँ अदना भी हूँ आ'ला भी 'ज़हीन'ख़ुद पहुँच जाएगी जो चीज़ जहाँ से आई
जुज़्व-ए-ईमाँ है मोहब्बत अहल-ए-बैत-ए-पाक कीदिल में पैहम ख़्वाहिश-ए-तकमील-ए-ईमाँ चाहिए
दिल का आईना-ए-ग़ुबार मा-सिवा से पाक हैमा’सियत से दूर रखती है ये सोहबत पीर की
रौज़ा-ए-पाक पे पहुँचे तो ये ठंडक पहुँचीसोज़-ए-फ़ुर्क़त न रहा दिल की जलन भूल गए
अगर उस बारगाह-ए-पाक में तेरा गुज़र होवेतो मिस्ल-ए-तज़्किरा इतना तो ऐ बाद-ए-सबा कहिए
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