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पिया रात तोरे गरे लागहम बड़े चैन से सोई
फरकन लाग सखी भुज मोराऔर लगै फरकै आँखों बाएँ
मोहन जागो उठो मुख धोवोद्वारे ठाड़े हैं लोग लुगाई
ये हम देखा अजब तमाशाघट घट पाया वही का बासा
कहा होवत है डंडी सोंतज कर वा को फंद
नींद उचट गई नीर बहे नितअंचरा होत निचुवन जोग
मोरा मनवा लाग गैलो प्यारे सोंअब घर मोसूँ रहिलो ना जाय
गुर की कृपा जब भई मो परतब घर में आयो पिया मेरे
मन ज़ुल्फन मा फँस फँस कैमोहे बताओ कब निकस सकै
छन पल घड़ी निस दिन तुम प्यारेबने रहो जिव आगे मोरे
तू है दर की तेग़ के जैसादेखा क़लंदर जग बन ऐसा
था ज़ब्त बहुत मुश्किल इस सैल-ए-मआ'नी काकह डाले क़लंदर ने असरार-ए-किताब आख़िर
जिस को आज़ादी मिली है 'इश्क़ में फिर वो मुदामका'बा-ओ-बुत-ख़ाना में फिरता क़लंदर-वार है
न तख़्त-ओ-ताज में ने लश्कर-ओ-सिपाह में हैजो बात मर्द-ए-क़लंदर की बारगाह में है
पानी-पानी कर गई मुझ को क़लंदर की ये बाततू झुका जब ग़ैर के आगे न मन तेरा न तन
इल्तिजा किस से करूँ तेरे सिवाया इलाही कर मिरी हाजत-रवा
जिस ने कोई यूसुफ़ कोई या'क़ूब बनायाउस ने मुझे तालिब तुझे मतलूब बनाया
दिल जिस की मोहब्बत में गिरफ़्तार है मेरावो दुश्मन-ए-जानी ओ दिल-आज़ार है मेरा
निशाँ इस का किसी से कब बयाँ होवही पावे निशाँ जो बे-निशाँ हो
आदम को मलक कहते थे क्या ख़ाक बनेगासमझे न कि सर-ता-क़दम इदराक बनेगा
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