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कलाम
आख़िर ख़ुदा-ए-बे-निशाँ आया नज़र सिफ़ात मेंसुनते तो थे अज़ल से ही देखा किसी की ज़ात में
ग़ुलाम रसूल क़ादरी
कलाम
गुरु दर्शन भगवान का दर्शन सिफ़त में ज़ात समाई रेगुरु बिन ज्ञान नहीं भई साधो गुरु ने बात बताई रे
मीराँ भीख
कलाम
सभी ज़ात सिफ़ात से हो निर्मल जब साधू सुन माँह ध्यान धरेसुमर सुमर सिमरन से परे नारायण हरे नारायण हरे
मीराँ भीख
कलाम
मौसूफ़ सिफ़त में पिन्हाँ है तन्क़ीद गवारा कैसे होहै दीद-ए-बुताँ दीदार-ए-ख़ुदा इंकार का यारा कैसे हो
ग़ुलाम रसूल क़ादरी
कलाम
ख़्वाजा ग़ुलाम फ़रीद
कलाम
अगर ऐ नसीम-ए-सहर तिरा हो गुज़र दयार-ए-हिजाज़ मेंमिरी चश्म-ए-तर का सलाम कहना हुज़ूर-ए-बंदा-नवाज़ में
अख़्तर शीरानी
कलाम
मिरी फ़ितरत वफ़ा है दे रहा हूँ इम्तिहाँ फिर भीवो फ़ितरत-आश्ना है और मुझ से बद-गुमाँ फिर भी
सीमाब अकबराबादी
कलाम
जो सालिक है तो अपने नफ़्स का इरफ़ान पैदा करहक़ीक़त तेरी क्या है पहले ये पहचान पैदा कर
सीमाब अकबराबादी
कलाम
नसीम-ए-सुब्ह गुलशन में गुलों से खेलती होगीकिसी की आख़िरी हिचकी किसी की दिल लगी होगी
सीमाब अकबराबादी
कलाम
हरम और दैर के कतबे वो देखे जिस को फ़ुर्सत हैयहाँ हद्द-ए-नज़र तक सिर्फ़ उ'न्वान-ए-मोहब्बत है
सीमाब अकबराबादी
कलाम
फ़ज़ा पैदा नहीं करती कहीं दीवाना बरसों सेनहीं उठता कोई पैग़म्बर-ए-वीराना बरसों से