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कलाम
बे-अदबाँ न सार अदब दी गए अदब थीं वांजे हूजेहड़े होण मिट्टी दे भांडे कदी न थीवण कांजे हू
सुल्तान बाहू
कलाम
करते हैं बे-दहान-ओ-ज़बाँ गुफ़्तुगू वो 'फ़ैज़'ऐसा कलाम हम ने किसी का सुना नहीं
मीर शम्सुद्दीन फ़ैज़
कलाम
निशात-ओ-कैफ़ का आ'लम ज़मीं से आसमाँ तक हैख़ुदा मा'लूम तेरे हुस्न की दुनिया कहाँ तक है
माहिरउल क़ादरी
कलाम
आख़िर-ए-शब के हम-सफ़र 'फ़ैज़' न जाने क्या हुएरह गई किस जगह सबा सुब्ह किधर निकल गई
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
कलाम
उस मक़ाम-ए-क़ुर्ब तक अब 'इश्क़ पहुँचा है जहाँदीदा-ओ-दिल का भी अक्सर वास्ता होता नहीं