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कलाम
न तु कश्फ़-ए-दस्त-ए-मसीह दे न तजल्ली-ए-सर-ए-तूर देतेरे बस में अगर ऐ ख़ुदा मुझे ज़िंदगी का शु'ऊर दे
इज़हार असर
कलाम
इश्क़ में तेरे कोह-ए-ग़म सर पे लिया जो हो सो होऐश-ओ-निशात-ए-ज़िंदगी छोड़ दिया जो हो सो हो
शाह नियाज़ अहमद बरेलवी
कलाम
फिर चराग़-ए-लाला से रौशन हुए कोह-ओ-दमनमुझ को फिर नग़्मों पे उकसाने लगा मुर्ग़-ए-चमन
अल्लामा इक़बाल
कलाम
बन कर मैं कभी मूसा सर-ए-तूर जा रहा हूँई'सा मैं कभी बन कर मर्दे जिला रहा हूँ
ज़ुहूरुल्लाह इफ़्तिख़ारी मुजीबी
कलाम
गुज़रना सर से बाम-ए-’इश्क़ का चढ़ना उतरना हैजो मरना है वो जीना है जो सूली है वो ज़ीना है