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कलाम
फ़िराक़ गोरखपुरी
कलाम
शाम-ए-फ़िराक़ अब न पूछ आई और आ के टल गईदिल था कि फिर बहल गया जाँ थी कि फिर सँभल गई
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
कलाम
जाम-ए-गदाई हाथ में लिए शाम सवेरे फिरते हैंशम्स-ओ-क़मर ये दोनों सिपाही हुक्म के फेरे फिरते हैं