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कलाम
मैं शम-ए-फ़रोज़ाँ हूँ मैं आतिश-ए-लर्ज़ां हूँमैं सोज़िश-ए-हिज्राँ हूँ मैं मंज़िल-ए-परवानः
वासिफ़ अली वासिफ़
कलाम
पर्दा-ए-शौक़ है यही सूरत-ए-राज़ है यहीतुम हो नज़र के सामने मेरी नमाज़ है यही
शाह तक़ी राज़ बरेलवी
कलाम
'राज़' उस राज़ को क्या समझेंगे दुनिया वालेमेरी शाही है यही हाल-ए-फ़क़ीराना मिरा
शाह तक़ी राज़ बरेलवी
कलाम
अभी तक राज़ गर तुम को समझते हैं जहाँ वालेकहीं तुम ये न कह देना कि राज़-ए-दो-जहाँ मैं हौं
शाह तक़ी राज़ बरेलवी
कलाम
ये 'राज़'-गर की करामत नहीं तो क्या है राज़ग़ुलाम-ए-सिलसिला-ए-नाम-ए-बू-तुराब किया
शाह तक़ी राज़ बरेलवी
कलाम
शाह तक़ी राज़ बरेलवी
कलाम
ऐ 'राज़' शक्ल-ए-राज़ को लिल्लाह छोड़ देसब के लबों पे 'आम हो अफ़्साना बन के जी
शाह तक़ी राज़ बरेलवी
कलाम
फ़ुग़ान-ए-राज़ को ऐ राज़ गर तुम क्यूँ नहीं सुनतेकि वो कब से फ़ुग़ाँ करता है तुम बेदार कैसे हो
शाह तक़ी राज़ बरेलवी
कलाम
वो आँख कि जिस ने परखा था समझा था हमारा राज़-ए-दिलऐ 'राज़' मज़ा तो ये देखो वो राज़ हमारा भूल गई
शाह तक़ी राज़ बरेलवी
कलाम
'सौदा-गर' 'आशिक़ यही कहता है शब-ओ-रोज़हाफ़िज़ मिरे सीने में है मिर्ज़ा मिरे दिल में