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कलाम
सच है शह-रग से क़रीं अल्लाह मियाँ है रे मियाँतुझ में ये माद्दा समझने का कहाँ है रे मयाँ
अज़ीज़ुद्दीन रिज़वाँ क़ादरी
कलाम
मिरे दिल की हर इक रग ख़ूँ-चकाँ मा'लूम होती हैतमन्नाओं की दुनिया गुलिस्ताँ मा'लूम होती है
माहिरुल क़ादरी
कलाम
वो जो एक दम को भी आ गए रग-ओ-पै में मेरी समा गएवो कुछ ऐसी आग लगा गए कि जला के मुझ को बुझा गए
इम्दाद अ'ली उ'ल्वी
कलाम
बेदम शाह वारसी
कलाम
'अक़्ल का हुक्म है उधर तू न जाना ऐ दिल'इश्क़ कहता है कि फिर वाँ से न आना ऐ दिल
शाह तुराब अली क़लंदर
कलाम
किस घर में किस हिजाब में ऐ जाँ निहाँ हो तुमहम राह देखते हैं तुम्हारी कहाँ हो तुम
शाह अकबर दानापूरी
कलाम
दिल ने हमारे बैठे-बैठे कैसे-कैसे रोग लगाएतुम ने किसी का नाम लिया और आँखों में अपनी आँसू आए
इब्न-ए-इंशा
कलाम
मिज़्गान-ए-तर हूँ या रग-ए-ताक-ए-बुरीदा हूँजो कुछ कि हूँ सो हूँ ग़रज़ आफ़त-रसीदा हूँ
ख़्वाजा मीर दर्द
कलाम
शाह अकबर दानापूरी
कलाम
ऐ दिल-ए-पुर-सुरूर-ए-मन नाज़ न बन नियाज़ बनसाक़ी-ए-मस्त-ए-नाज़ की आँखों में सरफ़राज़ बन