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कलाम
ऐ दिल-ए-पुर-सुरूर-ए-मन नाज़ न बन नियाज़ बनसाक़ी-ए-मस्त-ए-नाज़ की आँखों में सरफ़राज़ बन
शाह मोहसिन दानापुरी
कलाम
सिरिश्त-ए-दिल से ना-वाक़िफ़ मज़ाक़-ए-दिल नहीं समझावो क्या समझा जो ग़म को ज़ीस्त का हासिल नहीं समझा
मख़मूर देहलवी
कलाम
न सुर्मगीं हो तो ऐ तुर्क-ए-चश्म मेरे हुज़ूरलगा न तीर-ए-निगह दिल पे मेरे पहन के शिकस्त
शाह तुराब अली क़लंदर
कलाम
जो अहल-ए-दिल हैं वो हर दिल को अपना दिल समझते हैंमक़ाम-ए-'इश्क़ में हर गाम को मंज़िल समझते हैं
अमीर बख़्श साबरी
कलाम
लरज़ता है मिरा दिल ज़हमत-ए-मेहर-ए-दरख़्शाँ परमैं हूँ वो क़तरा-ए-शबनम कि हो ख़ार-ए-बयाबाँ पर