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कलाम
ऐ दिल-ए-पुर-सुरूर-ए-मन नाज़ न बन नियाज़ बनसाक़ी-ए-मस्त-ए-नाज़ की आँखों में सरफ़राज़ बन
शाह मोहसिन दानापुरी
कलाम
न सुर्मगीं हो तो ऐ तुर्क-ए-चश्म मेरे हुज़ूरलगा न तीर-ए-निगह दिल पे मेरे पहन के शिकस्त
शाह तुराब अली क़लंदर
कलाम
जो अहल-ए-दिल हैं वो हर दिल को अपना दिल समझते हैंमक़ाम-ए-'इश्क़ में हर गाम को मंज़िल समझते हैं
अमीर बख़्श साबरी
कलाम
तुरफ़ा क़ुरैशी
कलाम
लरज़ता है मिरा दिल ज़हमत-ए-मेहर-ए-दरख़्शाँ परमैं हूँ वो क़तरा-ए-शबनम कि हो ख़ार-ए-बयाबाँ पर
मिर्ज़ा ग़ालिब
कलाम
बहज़ाद लखनवी
कलाम
दाम-ए-कोन अंदर फँसा क्यूँ किस लिए किस वास्तेमुर्ग़-ए-बाग़-ए-किबरिया दिल हाय दिल अफ़्सोस दिल
अज्ञात
कलाम
शरीक-ए-हाल-ए-'आशिक़ बे-कसी में कौन होता हैजो निकली भी तो कुछ दिल-सोज़ आह-ए-आतिशीं निकली
अमीर मीनाई
कलाम
दिल जिगर को आश्ना-ए-दर्द-ए-उल्फ़त कर दियाइक निगाह-ए-नाज़ ने सामान-ए-राहत कर दिया