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आ ऐ जुनून-ए-'इश्क़ की तकमील-ए-ज़ीस्त होतोड़ूँ तिलिस्म ख़ाना-ए-अर्ज़-ओ-समा को मैं
मिला है साया-ए-दीवार-ए-जानाँबस अब तो हश्र तक को सो गए हम
करवटें मैं जो बदलता हूँ तो ये मतलब हैजो पहलू-ए-दिल-ए-मुज़्तर को क़रार आ जाए
बढ़ जाए 'इश्क़ अबरू-ए-ख़मदार और भीपड़ जाए एक ज़ख़्म पे तलवार और भी
क़ासिद से पूछता है वो अल्लाह रे पास-ए-नंगख़त में तो शौक़-ए-वस्ल किसी का रक़म नहीं
उम्मीद नहीं है शब-ए-फ़ुर्क़त में कि हो सुब्हफिर शाम से होता है वही दर्द-ए-जिगर आज
ऐ 'शीरीं' कूच जानिब-ए-मुल्क-ए-'अदम है अबकब तक मैं इंतिज़ार बुत-ए-बेवफ़ा करूँ
और एक थोड़ी सी साक़ी मेरे साक़ी दे देअभी गुंजाइश-ए-मय-ख़ाना है पैमाने में
कार-ए-इम्रोज़ ब-फ़र्दा म-गुज़ार ऐ ग़ाफ़िलमुँह दिखाना है तो फिर वा'दा-ए-फ़र्दा कैसा
लुत्फ़ से बाग़-ए-जहाँ में सूरत-ए-शबनम रहेएक ही शब को रहे लेकिन गुलों में हम रहे
एक क़तरा-ए-ना-चीज़ था जो ख़ून-ए-जिगर मेंआँखों से उमँडता हुआ दरिया नज़र आया
मस्लहत-कोशी-ए-अहबाब से दम घुटता हैकिसी जानिब से कोई नारा-ए-याहू आए
पैकर-ए-काइनात में जब है वो पैकर-ए-सुकूँमहशर-ए-इज़्तिराब क्यूँ सीना-ए-काइनात में
कब तक ये नज़र सू-ए-हरम नासेह-ए-नादाँऐ 'अक़्ल के अंधे हरम-ए-दिल की तरफ़ देख
'मीराँ शाह की लीजे ख़बरऐ माह-ए-ताबाँ नूर-ए-नज़र
‘मीरान’ शाह सर के बल तू अब चल पीरान-ए-कलियरफ़ैज़-ए-'आम गंज-ए-मख़्फ़ी साबिर लुटा रहा है
घटा बन के 'अलताफ़' रिंदों पे बरसेगुलिस्ताँ में बाद-ए-सबा बन गए तुम
याद-ए-दुर्र-ए-दनदाँ में गई जान मिरी 'रिंद'तक़दीर ने कुश्ता किया हीरे की कनी का
ऐ फ़ित्रत-ए-आवारा ऐ जल्वा-ए-हरजाईक्या इ'ल्म में है तेरे मेरा ग़म-ए-तन्हाई
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