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कलाम
सच है शह-रग से क़रीं अल्लाह मियाँ है रे मियाँतुझ में ये माद्दा समझने का कहाँ है रे मयाँ
अज़ीज़ुद्दीन रिज़वाँ क़ादरी
कलाम
इब्तिदा में हज़रत-ए-इंसान क्या था क्या हुआग़ौर कर ख़ुद को ज़रा पहचान क्या था क्या हुआ
अज़ीज़ुद्दीन रिज़वाँ क़ादरी
कलाम
अख़्तर शीरानी
कलाम
बुतों के 'इश्क़ में खोया गया हूँ वर्ना ऐ 'अख़्तर'ख़ुदा शाहिद है मैं अक्सर ख़ुदा को याद करता हूँ
हरी चंद अख़्तर
कलाम
मुझ मुज्रिम-ए-उल्फ़त को जो चाहो वो सज़ा दोमैं हाज़िर-ए-दरबार हूँ ऐ जान-ए-तमन्ना
ग़ुलाम मोईनुद्दीन गिलानी
कलाम
जिस्म दमकता ज़ुल्फ़ घनेरी रंगीं लब आँखें जादूसंग-ए-मरमर ऊदा बादल सुर्ख़ शफ़क़ हैराँ आहू
जावेद अख़्तर
कलाम
अब क्या सोचें क्या होना है जो होगा अच्छा होगापहले सोचा होता पागल अब रोने से क्या होगा
जावेद अख़्तर
कलाम
भरोसा किस क़दर है तुझ को 'अख़्तर' उस की रहमत परअगर वो शैख़-साहिब का ख़ुदा निकला तो क्या होगा
हरी चंद अख़्तर
कलाम
अब तो अपना लीजिए हज़रत दिल-ए-'मुश्ताक़' कोखा रहा है ठोकरें क़िस्मत का मारा आज-कल