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कलाम
अ'दम से जानिब-ए-हस्ती 'निज़ामी'-ए-ख़स्तातलाश-ए-यार में वक़्फ़-ए-तलाश-ए-यार रहा
अमानत अ'ली निज़ामी
कलाम
मोहब्बत पर मदार-ए-हसती-ए-कौनैन है 'माहिर'ये वो नुक्ता है जिस को साहिबान-ए-दिल समझते हैं
माहिरउल क़ादरी
कलाम
शुक्र है अल्लाह का कि बज़्म-ए-मय-ख़्वारों में आजहज़रत-ए-'असग़र' से भी अपनी शनासाई हुई
असग़र निज़ामी
कलाम
तमीईज़-ए-कमाल-ओ-नुक़्स उठा ये तो रौशन है दुनिया परमैं चंदन हूँ तू कुंदन है मैं मिट्टी हूँ तू सोना है
साग़र निज़ामी
कलाम
जो ख़ुदी को अपने मिटाएगा तो ख़ुदा की ज़ात को पाएगातुझे उस का नूर है देखना तो मिसाल-ए-चाँद-गहन में जा
असग़र निज़ामी
कलाम
वही आबले हैं वही जलन कोई सोज़-ए-दिल में कमी नहींजो लगा के आग गए हो तुम वो लगी हुई है बुझी नहीं
फ़ना निज़ामी कानपुरी
कलाम
अगर उस बारगाह-ए-पाक में तेरा गुज़र होवेतो मिस्ल-ए-तज़्किरा इतना तो ऐ बाद-ए-सबा कहिए