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कलाम
दिल वारस्ता ही अपना अकेला रह गया आख़िरबहुत थे हम-सफ़र लेकिन हर इक पाबंद-ए-मंज़िल था
ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मजज़ूब
कलाम
जिन के महलों में हज़ारों रंग के फ़ानूस थेझाड़ उन की क़ब्र पर हैं और निशाँ कुछ भी नहीं
शाह वारिस अली
कलाम
वारिस शाह
कलाम
किया हर नफ़्स को ज़िंदा साक़ी मुझे पिला केहर दम न ला रहा है कलिमा पढ़ा पढ़ा के
पीर अमीर शाह क़ादरी
कलाम
ज़ुहूर-ए-नूर-ए-रहमत है तमाम अतराफ़ का'बा मेंक़लम क्या ख़ाक उठाएगा कोई औसाफ़ का'बा में
हाजी वारिस अली शाह
कलाम
सच है शह-रग से क़रीं अल्लाह मियाँ है रे मियाँतुझ में ये माद्दा समझने का कहाँ है रे मयाँ