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यसरिब के बसय्या मन-मोहन मिरी बिरह-अगन को बुझा देनामोरी बीच में नय्या डूबत है मोहे कुंड से पार लंघा देना
रह्म खा हाल पे ‘ज़ाहिर’ के बराए यसरिबजान-ओ-दिल तुझ पे वो क़ुर्बान किए बैठे हैं
गिरते हुओं को थाम लिया जिस के हाथ नेऐ ताज-दार-ए-यसरिब-ओ-बतहा तुम्हीं तो हो
का दिलकश है तुमरी डगरी दिल छीनत है बतहा नगरीज़ाकिर चे कुनम गुलज़ार-ए-जनाह मोहे भा गईं यसरिब की गलियाँ
ख़ुदा की क़सम कोई दुखिया सवाली मदीना से आता नहीं हाथ ख़ालीबड़े बंदा-पर्वर हैं यसरिब के वाली बहुत 'आम है उन की बंदा-नवाज़ी
उस पीत में जो कुछ मुझ पे बनी क्या तुम से कहूँ यसरिब की धनीथी आस मदीने आके मरूँ तुम मुझ को बुलाना भूल गए
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