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होली

होली पर सूफ़ी संतों के प्रचलित कलाम सूफ़ीनामा में पढ़िए

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अब की होरी का रंग न पूछो

शाह तुराब अली क़लंदर

होरी होय रही अहमद जियो के द्वार

शाह नियाज़ अहमद बरेलवी

कैसे न मोरा जिव घबराय

शाह तुराब अली क़लंदर

कैसो रचो री रंग होरी अजमेर ख़्वाजा

शाह नियाज़ अहमद बरेलवी

सुन मोरी सजनी रुत फागुन की है बहार

शाह नियाज़ अहमद बरेलवी

कौन करे अब तीरथ बान

शाह तुराब अली क़लंदर

यह वृजबाला नन्द का लाला

शाह तुराब अली क़लंदर

औ नंदलाल कुँवर बृजराव

शाह तुराब अली क़लंदर

को खेले वा सो होरी रे लोगो

शाह तुराब अली क़लंदर

हर देखत हूँ सब तोरी झलक

मख़दूम ख़ादिम सफ़ी

हमरी सभा में वह आवत नाहीं

शाह तुराब अली क़लंदर

होरी मां बृजोरी

मख़दूम ख़ादिम सफ़ी

हरदम हरनाम भजोरी।

मुस्तफ़ा ख़ान यकरंग

हमका तुम क्यूँ भुलावत

मख़दूम ख़ादिम सफ़ी

आज आए बलम मो से अटके

मख़दूम ख़ादिम सफ़ी

देख सखी कहूँ रंग न डाले

शाह तुराब अली क़लंदर

फागुन मा पिया मोसे रिसाय

शाह तुराब अली क़लंदर

कारे कनहैया मैं गारी देत हूँ

शाह तुराब अली क़लंदर

जाको नहीं कोई देख सकत है

शाह तुराब अली क़लंदर

हम से पिया से लगी है आँख

मख़दूम ख़ादिम सफ़ी
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