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जायसी और प्रेमतत्व पंडित परशुराम चतुर्वेदी, एम. ए., एल्.-एल्. बी.

हिंदुस्तानी पत्रिका

जायसी और प्रेमतत्व पंडित परशुराम चतुर्वेदी, एम. ए., एल्.-एल्. बी.

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    रोचक तथ्य

    Jayasi or Premtataw, Anka-3, 1934

    जायसी की रचना पद्मावत की प्रेम-गाथा द्वारा अथवा उन के ग्रंथ अखरावट में वर्णन किए गए सिद्धांतों द्वारा जिस प्रेमतत्व का परिचय मिलता है वह वास्तव में बहुत ही उच्च गंभीर है और उस के महत्व का पता हमे पहले-पहल उस समय चलता है जब कि, हीरामन तोता द्वारा पद्मावती के रूप गुण का संक्षिप्तमात्र समाचार पाते ही, राजा रतनसेन उस के प्रेम में पड़ कर कह उठता है-

    तौनि लोक चौदह खंड, सबै परै मोहिं सूझि।

    प्रेम छाँडि नहिं लोन किछु, जो देखा मुन बूझि।।

    अर्थात् अब मुझे तीनों लोक और चौदहों भुवन प्रत्यक्ष हो गए और मैं ने अपने मन में समझ बूझ कर देख लिया कि वास्तव में प्रेम के समान कोई भी वस्तु सुंदर नहीं हो सकती। अभिप्राय यह है कि संसार की किसी भी वस्तु में ऐसी सुंदरता नहीं मिल सकती जो प्रत्येक स्थिति अथवा दशा में भी एक समान हो कर वर्तमान रहे। यह प्रेम की ही विशेषता है कि,

    मुहमद बाजी प्रेम कै, ज्यों भावै त्यों खेल।

    तिल फूलहिं के संग ज्यों, होइ फुलायल तेल।।

    अर्थात् प्रेम की बाज़ी किसी प्रकार भी खेली जाय उस में लाभ ही लाभ है जैसे तिल के दाने, फूलों के सहवास के उपलक्ष में यदि पेरे भी जाते है तो अंत में उन का रूप सुंगधित लेत बन कर ही प्रकट होता है। प्रेम के कारण अथवा प्रेम का परिणाम-स्वरूप दुख हो ही नही सकता। इस का तो नियम ही है कि-

    प्रेम कै आगि जदै जौं कोई।

    दुख तेहि कर अँविरथा होई।।

    अर्थात् प्रेम की ज्वाला में अपने को भस्मात् कर देने वाले का दुःख कभी व्यर्थ नहीं जाता। उस के दुःखों के साथ ही साथ सुख भी लगा ही रहता है जिस कारण उस के आनंद में बाधा नहीं पड़ पाती और-

    दुख भीतर जो प्रेम-मधु राखा।

    जग नहिं मरन सहै जो चाखा।।

    अर्थात् प्रेम की पीर के साथ ही जो माधुर्य अनुभव में आता है उस का स्वाद इतना तीव्र होता है कि उस के सामने संसार में मरण तक का कष्ट हँसते-खेलने सह लेना कोई असंभव बात नहीं। इस कारण प्रेम नितांत रूप से सदा एख-सम समझा जाता है और इस की एकरसता ही इस के वास्तविक सौंदर्य का कारण है। इस अनुपम गुण के ही संयोग से-

    मानुष प्रेम भएउ बैकुंडी।

    नाहिंत काह छार भर मूठी।।

    अर्थात् इस प्रेम के ही कारण मनुष्य अमरत्व तक प्राप्त कर लेता है, नहीं तो इस मूठी भर छार मात्र से बने हुए मिट्टी के पुतले से हो ही क्या सकता था? अतएव कवि को इस बात पर पूर्ण विश्वास है कि-

    प्रेम पंथ जौं पहुँचे पारा।

    बहुरि मिलै आइ एहि छारा।।

    अर्थात् जो मनुष्य प्रेममार्ग का पथिक होकर पार पहुच गया वह फिर मिट्टी से ही मिलते के लिए इस क्षणभंगुर शरीर को धारण कर नहीं सकता। वह अमर हो