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देव और बिहारी विषयक विवादः उपलब्धियाँ- किशोरी लाल

हिंदुस्तानी पत्रिका

देव और बिहारी विषयक विवादः उपलब्धियाँ- किशोरी लाल

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    रीतियुग की काव्य-रचना ऐहिक जीवन के मादक एवं सरस प्रभावों से पूर्ण तथा अनुप्राणित रही है, यही कारण है कि उस युग की समस्त श्रृंगारिक रचनाएँ आधुनिक जीवन की चिन्ता से सर्वथा मुक्त है। इनमें ऐन्द्रिय संवेदना के इतने बिखरे हुए चित्र मिलेंगे, जिन्हें दूसरे युग का वाङ्मय नहीं दे सकेगा। डा. ग्रियर्सन ने सत्रहवीं शताब्दी के मध्य की रचनाओं की तुलना ‘आगस्टन युग’ की रचनाओं से की है। अँग्रेजी साहित्य के इतिहास में यह युग काव्य-कला एवं काव्य-कौशल युग के रूप में अभिहित किया गया है। देव और बिहारी इसी आगस्टन युग के कलाकार थे। डा. रसाल ने देव और बिहारी जैसे कवियों की उत्कृष्ट काव्य-कला समन्वित रचनाओं के कारण इस युग को ‘काव्य-कला’ युग कहता अधिक औचित्य-पूर्ण समझा है।

    दूसरी ओर, जीवन की नैतिक मान्यताओं की कसौटी पर खरे उतरने के कारण देव और बिहारी की रचनाओं को उपेक्षणीय दृष्टि से देखा गया है। किन्तु सत्य यह है कि रीति युग के कलाकार आत्म स्वर के साधक नहीं थे, उनकी वाणी यौवन के उन्माद का ही श्रृंगार करती रही। उनकी दृष्टि ‘कला के लिए’ जैसे सिद्धान्त में संतुलित रही, इस तथ्य को ठीक से ग्रहण करने के कारण एडविन ग्रीब्ज महोदय की बिहारी विषयक समीक्षा विचारणीय है। उनके अनुसार बिहारी में मात्र बौद्धिक प्रगल्भता थी। उनमें स्वात्य वैशिष्ट्य निरूपण की चेतना का सर्वथा अभाव था। उन्होंने हिन्दी-साहित्य की प्रगतिशील बनाने का कोई प्रयास नहीं किया। वास्तव में ग्रीब्ज महोदय के इस कथन में सत्यांश होते हुए भी इतना स्पष्ट है कि उन्होंने बिहारी की सूक्ष्म कला विधायिनी प्रतिभा और सौन्दर्यानुभूति के मार्मिक स्वरूप का विश्लेषण यथोचित रूप से नहीं किया। यही नहीं, पं. कृष्ण बिहारी मिश्र के अनुसार ग्रीब्ज महोदय ने देव और बिहारी के कवि होने में भी संदेह व्यक्त किया है। वस्तुतः हिन्दी आलोचना के इतिहास में देव और बिहारी विषयक विवाद की चर्चा एक ऐसी महत्वपूर्ण कड़ी है जिसने परवर्ती आलोचना के स्वरूप के संगठन में पर्याप्त योग दिया है। इस लेख का विषय देव और बिहारी विषयक विवाद और उपलब्धियों की विस्तारपूर्वक समीक्षा करना है। इस विवाद के मैदान में कई योद्धा एवं प्रभविष्णु आलोचक उतरे। बिहारी की अपने अमोघ वाग्-वाण से रक्षा करने वालों में लाला भगवानदोन एवं पं. पद्म सिंह शर्मा का नाम उल्लेखनीय है। बाद में पंडित लोकनाथ द्विवेदी सिलाकारी भी इस क्षेत्र में उतरे, किन्तु देव विषयक विवाद श्रृंखला की बढाने वालों में मिश्रबन्धु तथा पं. कृष्ण बिहारी मिश्र अग्रगण्य हैं। देव और बिहारी के इस विवाद से मूलतः कई मौलिक तथ्य प्रकाश में आये। इन तथ्यों एवं उपलब्धियों की चर्चा सुविधानुसार इस प्रकार की जा सकती हैः-

    1. प्रौढ़ एवं व्यवस्थित तुलनात्मक आलोचना का प्रवर्तन।

    2. शुद्ध पाठ और अर्थ विषयक भ्रांतियों का निराकरण।

    3. शब्दों की निरुक्ति विषयक छानबीन।

    4. भाषागत विकृतियों एवं व्याकरणिक स्वरूप का विवेचन।

    5. भाव-सौन्दर्य एवं कलागत सूक्ष्म तत्वों का निरूपण।

    काव्य-स्वरूप के विश्लेषण में तुलनात्मक अनुशीलन का महत्व अस्वीकार नहीं किया जा सकता। वस्तु के स्वरूप का यथार्थ महत्व और ज्ञान तभी हो सकता है, जब असमानता की दृष्टि से पूर्णतया विवेचन किया जाय। हिन्दी में इस पद्धति के प्रचलन के पूर्व इसका रूप हिन्दी एवं संस्कृत की महत्वपूर्ण सूक्तियों में ही सिमटा रहा था। उदाहरण के लिए-

    (क) सूर सूर तुलसी शशी, उड्गन केशवादस।

    अब के कवि खद्योत सम, जहँ तहँ करत प्रकास।

    (ख) दंडिनः पदलालित्यं भारवे अर्थगौरवम्।

    उपमा कालिदासस्य माधे सन्ति त्रयो गुणः।।

    हिन्दी में तुलनात्मक आलोचना का अन्य रूप प्राचीन टीका-ग्रन्थों में भी उपलब्ध होता है। श्रीपति ने अपने काव्य सरोज में सेनापति और केशवदास आदि के काव्य की समीक्षा की है। प्रधानतः तुलनात्मक आलोचना का उत्कृष्ट रूप मिश्रबन्धुओं के ‘हिन्दी नवरत्न’ में देखने को मिला। इसमें श्रेष्ठता के अनुसार हिन्दी के नव कवियों की तुलनात्मक समीक्षा प्रस्तुत की गई और सबसे मुख्य बात यह थी कि इसमे तुलसी और सूर के पश्चात् देव को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ। देव और बिहारी विषयक विवाद की अविच्छिन्न धारा का सूत्रपात्र यहीं से होता है। इसके अनन्तर बिहारी पर लगाए गए आरोपों का समुचित उत्तर देने के लिए कमर कसकर इस युद्ध में कूदनेवालों में थे, पं. पद्मसिंह शर्मा। उन्होंने मिश्र-बन्धुओं के भद्दे और पक्षपातपूर्ण विचारों का प्रतिवाद बड़ी निष्ठा एवं गम्भीरता से किया। उनकी बिहारीसतसई के भाष्य की भूमिका इसी विवाद को पुरस्सर करती है। यहीं से हिंदी में प्रौढ़ एवं व्यवस्थित तुलनात्मक आलोचना का दर्शन हमें होता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें संस्कृत एवं प्राकृत की सुदीर्घ परपम्परा का अनुसरण करते हुए बिहारी की काव्यगत विशेषताओं का अत्यन्त मार्मिक एवं सहृदय-संवेद्य रूप उद्घाटित किया गया है। शर्मा जी की बिहारी विषयक गूढ़ एवं गम्भीर तथ्यग्राहिणी प्रतिभा का रूप सतसई में कई स्थलों पर देखने को मिला है। उनकी आलोचना का दूसरा रूप इसकी शास्त्रीयता थी। उनकी शास्त्रनिष्ठा प्रतिभा ने संस्कृत काव्य-शास्त्र की मान्य एवं सुदृढ़ परम्परा को ग्रहण करते हुए बिहारी के दोहों का गूढ़ गम्भीर विवेचन प्रस्तुत किया। शास्त्रीयता के आलोक में उन्होंने बिहारी के कई अनुद्घाटित मौलिक उपादनों की चर्चा की। उन्होंने बिहारी की काव्यगत सौन्दर्य-दीप्ति और वचन भंगिमा का मूल्यांकन अमरशतक, गाथा सप्तशती, आर्यासमप्तशती और विकट नितम्बा आदि के मुक्त छन्दों द्वारा की।

    शर्मा जी की तुलनात्मक समीक्षा के मूल में उनकी सहृदयता और आनन्द-भाव की तन्मयता भी व्याप्त रहती है। उनके ‘वाह उस्ताद, क्या कहने है’, ‘कितना माधुर्य है’ आदि वाक्य उनकी प्रभाववादी समीक्षा के ही रूप को व्यक्त करते हैं। इस प्रकार शर्मा जी ने अपनी तुलनात्मक आलोचना के क्रोड़ में हिन्दी समीक्षा-सिद्धान्त के अनेक रूपों को पल्लवित किया। इस दृष्टि से आधुनिक हिन्दी-समीक्षा शर्मा जी की पर्याप्त ऋणी है। इस दिशा में उनकी यह उपलब्धि श्लाध्य एवं प्रशंसनीय है।

    तुलनात्मक आलोचना के सामान्यतः तीन रूप मिलते हैं-

    1. किसी ग्रन्थ की टीका अथवा व्याख्या करते समय अन्य कवियों के समान भाव वाले छन्दों का उपोयग।

    2. किसी कवि की सांगोपांग समीक्षा करते समय कुछ प्रसंगों में अन्य कवियों के छन्दों से तुलना।

    3. दो कवियों की अनेक प्रसंगों में विशद व्याख्या ओर विवेचन।

    पं. कृष्णबिहारी जी मिश्र की तुलनात्मक समीक्षा उक्त तीसरे रूप के अन्तर्गत आती है। मिश्र जी से पूर्व शर्मा जी ने इस रूप के सूत्रपात में किसी भी प्रकार का योग नहीं दिया। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘देव और बिहारी संजीवन-भाष्यकार द्वारा मिश्र बन्धुओं पर लगाये गए आरोपों का जवाब देने के लिए लिखी थी। ‘देव और बिहारी’ के अन्तर्गत मिश्र जी ने बड़े संयम एवं गम्भीरता के साथ शर्मा जी के विचारों का खंडन किया है और देव और बिहारी विषयक अपनी धारणाओं को उत्तम शब्दों में स्पष्ट किया है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जैसे प्रतिष्ठित आलोचकों ने भी पं. कृष्णबिहारी मिश्र की इस संयमित आलोचना की प्रशंसा की है, और मिश्रबन्धुओं की अपेक्षा इन्हें आलोचना का सच्चा अधिकारी माना है। मिश्र जी की तुलनात्मक आलोचना ने समीक्षा के गर्हित एवं अभद्र स्वरूप के उभारने का प्रायः कोई प्रयास नहीं किया। इस दृष्टि से मिश्र जी की आलोचना के दो रूप अत्यन्त स्पष्ट हैः-

    1. आलोचना का अनाविल एवं निष्पक्ष स्वरूप।

    2. विवेचना शक्ति और कवि-सुलभ सहृदयता का समन्वय।

    मिश्र जी ने देव और बिहारी के विवादास्पद स्थलों का निर्णय अपनी मान्य एवं तर्कसंगत कसौटी के आधार पर किया है, उनकी आलोचना व्यंग्य और उपहास की प्रवृत्ति से बहुत कुछ बची है। उन्होंने बड़े निष्पक्ष भाव से बिहारी और देव के काव्य गुणों के सौंदर्य और काव्य गराम का विश्लेषण किया है। उनकी आलोचना के संतुलित रूप का एक नमूना लीजिए-

    ‘आकार एवं प्रकार में देव की कविता बिहारी के काव्य से अत्यधिक है, परन्तु लोकप्रियता में बिहारीलाल देव जी से कहीं अधिक यशस्वी हैं, संस्कृत एवं भाषा के अन्य कवियो के भावों को दोनों ही कवियों ने अपनाया है, पर यह वृत्ति देव की अपेक्षा बिहारीलाल में कदाचित् अधिक है, दोनों ही कवियों का काव्य मधुर ब्रजभाषा में निबद्ध है। मिश्र जी की सूक्ष्म विश्लेषणात्मक शक्ति और उनकी हृदयग्राहिता का नमूनाः

    ’चतुर माली जितनी सफाई से एक छोटे चमन को सजा सकता है, उतनी सफाई से समग्र वाटिका को सजाने में बड़े परिश्रम की आवश्यकता है। छोटे चित्र को रँगते समय यदि दो चार कूचियाँ भी चल गईं तो चित्र चमचमा उठता है। परन्तु बड़े चित्र को उसी प्रकार रंगना विशेष परिश्रम चाहता है।

    ‘देव बिहारी’ के पश्चात लाला भगवानदीन ने मिश्रबंधुओं के देव विषयक अनुचित पक्षपात और पं. कृष्ण बिहारी मिश्र द्वारा देव और बिहारी विषयक उठाए गए विवाद का उत्तर देने के लिए ‘बिहारी और देव’ नामक एक छोटी-सी पुस्तक लिखी। इसमें संदेह नहीं कि लाला जी की वस्तुनिष्ठ प्रतिभा ने देव की भाषा-विषयक विकृतियों की पकड़ में अपूर्व एवं अद्वितीय सफलता प्राप्त की, लेकिन देव की सूक्ष्म कलात्मक अनुभूतियों एवं सरसता के वे अधिक प्रशंसक नहीं थे। मिश्रबन्धुओं और पं. कृष्ण बिहारी मिश्र की आलोचना करते समय लाला जी में संतुलित दृष्टि का प्रायः अभाव मिलता है।

    देव और बिहारी विषयक दूसरी महत्वपूर्ण उपलब्धि शुद्ध पाठ अर्थ विषयक भ्रातियों के निराकरण से संबंधित है। यद्यपि इस युग का सम्पादन वैज्ञानिक पाठ शोधन की दृष्टि से अत्यधिक संतोषजनक नहीं है लेकिन अपनी साहित्यिक शोध परिधि एवं इयत्ता के अन्तर्गत उनका महत्व आज भी अक्षुण्ण है। वैज्ञानिक पाठ शोधन प्रणाली के समर्थक साहित्यिक सम्पादन की उपेक्षा करके अपने पाठ को सर्व प्रकारेण सुग्राह्य और वैज्ञानिक रूप नहीं दे पाते। वस्तुतः देव और बिहारी के इस झगड़े ने नानाविध शुद्ध पाठों और अर्थ-समस्या मूलक गुत्थियों को सुलझाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। अब उन विवादास्पद स्थलों पर विचार किया जायगा, जिनकी चर्चा उस युग की एक मनोरंजक घटना थी। बिहारी सतसई के कुछ भ्रष्ट पाठों का अंश लें -

    (क) बिहारी बिहार और प्रभुदयाल पांडे की सतसई का एक पाठ है-

    ‘डक कुडगत सी हवै चली दुकचित चली निहारी’

    मि(बंधुओं ने यही पाठ उत्तम माना और अर्थ भी इसी के आधार पर किया। किन्तु इस पाठ के विरुद्ध लाला भगवानदीन जी एक उत्तम और अर्थ संगत पाठ स्वीकार किया। उनका पाठ इस प्रकार है-

    (ख) डगकु डगति सी चलि उठकि, चितई चली निहारि

    उन्होंने डगकु के उचित अर्थ पर विचार करते हुए लिखा है कि यहाँ यह ‘एक डग’ के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। इसी प्रकार मिश्रबंधुओं ने ‘हिन्दी नवरत्न’ में ‘कुकत’ शब्द की विकृति के संबंध में अपने विचार प्रकट किए। लाला जी ने इस पाठ की शुद्धता के संबंध में संदेह व्यक्त किया और सही तथा दुरुस्त पाठ इस प्रकार प्रस्तुत किया- नतरकु कत इन बिध लगत उपजत बिरह कृसातु। मिश्रबन्धु महोदयों ने ‘नतरुक’ शब्द को ठीक नहीं माना। उनके कथनानुसार ‘नतरु’ शब्द होना चाहिए इसमे ‘कु’ प्रत्यय व्यर्थ है। वस्तुतः मिश्रबंधुओं की यह जाँच ठीक प्रतीत होती है।

    ‘खुंदी’ शब्द को मिश्रबन्धुओं ने एक देशीय एवं असाधारण माना है, किंतु लाला जी ने असाधारण एवं मोरड़ा हुआ नहीं माना। ‘लाय’ शब्द ‘लगनि’ अर्थ में सर्वथा अशुद्ध है। लाला जी के अनुसार लाय ‘आग’ के अर्थ में अब भी बुंदेलखंड में बोला जाता है। लाला जी ने ‘उलि’ को अशुद्ध बताया और शुद्ध पाठ ‘झूलि’ माना है, जिसका अर्थ ‘झूलना’ होता है। उसे मिश्रबंधुओं ने स्वीकार नहीं किया। मिश्रबंधुओं ने लाला जी की प्रसिद्ध पुस्तक ‘बिहारी-बोधिनी’ के कुछ शब्दों के पाठ और अर्थ के संबंध में आपत्ति प्रकट की है। ‘बिहारी बोधिनी’ के दोहा संख्या 31 में प्रयुक्त ‘जोर’ पाठ को मिश्रबंधुओं ने अशुद्ध माना है। उनके अनुसार ‘जौर’ (जुल्म) शब्द होना चाहिए। मिश्रबंधुओं की यह पकड़ उचित प्रतीत होती है, क्योंकि नीचे की पंक्ति में ‘और’ के तुर में ‘जोर’ अशुद्ध है। इसी प्रकार लाला जी के ‘दौरि’ अर्थ पर मिश्रबंधुओं ने आपत्ति प्रकट की है। उनके अनुसार ‘दौरि’ दौड़ने के ही अर्थ में है, उड़ने के लिए नहीं। लाला जी ने प्रभुदयाल पांडे के ‘तैन’ पाठ को अशुद्ध माना है और उसके स्थान पर ‘ऐन’ पाठ शुद्ध बताया है। इसी प्रकार पं. गणेश बिहारी मिश्र ने बहुत पहले देव के तीन ग्रंथों का सम्पादन ‘देव ग्रंथावली’ नाम से किया था। इसे काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने प्रकाशित किया था। इसमें पं. गणेश बिहारी मिश्र की गलत एवं भ्रांत टिप्पणियों की छानबीन लाला जी ने पर्याप्त श्रम के साथ की है। इसकी कुछ चर्चा की जा रही है। प्रेम चंद्रिका पृ. 3 पर उद्धृत ‘चख के चखक भरि चाखत ही जाँहि’ छन्द के ‘चखक’ का अर्थ मिश्र जी ने ‘गज़क’ लिखा है। इसके शुद्ध अर्थ चषक (प्याला) के संबंध में लाला जी ने पर्याप्त प्रकाश डाला है। कहीं-कहीं मिश्र जी ने पाठ ही बदल दिया, यथा, ‘जंबूरस बुंद जमुना जल तरंग में’ की जगह जंबू नद बुंद जमुना तरंग में पाठ कर दिया। ‘जंबूनद’ का अर्थ ‘सोना’ लिखा है। संस्कृत में सोना अर्थ अवश्य है, लेकिन प्रसंगानुसार यह अर्थ औचित्यपूर्ण नहीं है। आश्चर्य है कि लाला जी ने भी जंबूरस ‘जमुना का रस’ माना। यहाँ जंबूरस जामुन का रस ही उचित है। यत्र तत्र लाला जी की अर्थ-विषयक सूचनाएँ बड़े महत्व की है। एक स्थल पर उन्होंने मिश्र-बंधुओं के ‘सौरई’ और ‘दौरई’ की चर्चा करते हुए लिखा है कि ‘सौरई’ का अर्थ स्मरण और ‘दौरई’ का बेचैन और ‘रोमांच’ कथमपि नहीं होता। उनके अनुसार दौरई ‘श्यामता’ अर्थ में कौरई ‘सौरियाने’ अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। सौरियाना भिखमंगे के हठ के अर्थ में आज भी बोला जाता है। आधुनिक एवं प्राचीन हिन्दी कोशों में सौरई शब्द नहीं मिलता है। लाला जी की यह खोज सराहनीय है। कहीं-कहीं पाठों के कारण सारा अर्थ-सौष्ठव लुप्त हो जाता है और विकृत पाठों का यह दोष कवि की प्रतिभा के सिर मढ़ दिया जाता है। मिश्रबंधुओं ने देव के एक उत्तम छंद में पाठ-दोष का ध्यान देने के कारण दुःप्रबंध दूषण बताया है। लाला जी ने इस दोष का निराकरण करते हुए एक प्राचीन पाठ की समीचीनता पर पूर्णरूपेण विचार किया है। मिश्र बंधुओ और लाला जी के पाठों की बानगी दी जा रही है-

    मिश्रबंधुओं का पाठः (क) बड़े बड़े नैननि ते आँसू भरि भरि ढरि,

    गोरो गोरो मुख आज ओरो सो बलाने जात।

    लालाजी का पाठः (ख) बड़ी बड़ी आँखिन ते आँसू बड़े ढरि ढरि

    गोरे गोरे मुख परि ओरे से बिलात जात।

    अब ‘डाढ़ी’ शब्द लीजिए। इस शब्द का अर्थ मिश्रबंधु महोदय ‘दौरहा आग’ बतलाते है, लेकिन शिलाकारी जी ने लाया जी के आधार पर उसे ‘जली हुई’ अर्थ में ग्रहण किया है। वास्तव में जली हुई अर्थ में सूर और तुलसी आदि कवियों ने भी इसे प्रयुक्त किया है। अतः यही अर्थ ठीक है।

    इस विवाद ने कई शब्दों की निरुक्ति एवं उनके भिन्न-भिन्न प्रयोगों के औचित्य पर विचार करने की भी प्रेरणा दी। बहुत से लुप्त हो जाने वाले शब्दों की नये सिरे से छानबीन की गई। अतः निरुक्ति विषयक उपलब्धि उस युग की एक अति महत्वपूर्ण देन है। मध्ययुगीन काव्य के ये मनस्वी बहुत कुछ कोशकारों के भी दायित्व एवं अध्यवसाय को समेटे हुए अपनी साधना में सतत प्रयत्नशील रहे। देव के कुछ ऐसे शब्दों की सूची दी जा रही है, जिसे लाला जी ने देव के विकृत शब्दों की चर्चा करते हुए बहुत पहले पेश की थी-

    टिकासरो टेक+आश्रय

    दरब दर्प

    दुभीख दुर्भिक्ष

    मृगछी मृगाक्षी

    भभीख भविष्य

    ज्वारी ज्वानी

    कौल कमल

    उदेत उदोत

    ‘गौहरे’ शब्द की चर्चा सबसे पहले लोकनाथ द्विवेदी ने की। गौहरे यथार्थ में ब्रजभाषा का ठेठ शब्द अब भी ‘गोशाला’ अर्थ में बोला जाता है। ‘पनिहा’ शब्द का प्रयोग बिहारी-सतसई के अलावा हरीराम व्यास की रचनाओं में भी मिलता है। मिश्रबंधुओं ने इसे बुंदेलखंडी शब्द कहा है। लेकिन सिलाकारी जी ने इसे संस्कृत ‘प्रणिधा’ का अपभ्रंश माना है, जो औचित्यपूर्ण प्रतीत होता है, इसका अर्थ ‘दूत या गुप्तचर’ बतलाया गया है, ‘संक्षिप्त शब्द सागर’ में ‘पनहा’ शब्द मिला है, इसे कोशकार महोदय संस्कृत ‘पण’ का विकृत रूप बताते हैं और अर्थ चोर का ‘पता लगाने वाला’ दिया है। इसी प्रकार कई शब्दों को निरुक्ति विषयक वास्तविक सूचनाएँ पं. रामचन्द्र शुक्ल ने मिश्रबंधुओं की भ्रांतियों का निराकरण करने के सिलसिले में दीं, यथा, ‘समर’ सं. स्मर, संक्रांतिः सं. संक्रमण (अपभ्रंश संक्रोन) ‘सोने जाई’ सं. ‘स्वर्ण जाति’ अथवा स्वार्थयूथिका। संस्कृत में वारि और ‘वार’ दोनों है। ‘वार्द’ का अर्थ भी बादल होता है। लाला भगवानदीन ने ‘बाथ’ की उत्पत्ति पर विचार करते हुए लिखा है कि यह शब्द राजपूताने में बोला जाता है। इसका अर्थ अंकवार (सं. अंकमाल) है। संक्षिप्त शब्दसागर में इसका अर्थ तो दिया गया है,