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बसंती पत्ती

MORE BYचंद्रभान कैफ़ी देहलवी

    बसंत रुत है बहार शबाब की पत्ती

    महक रही है गुल-ए-आफ़्ताब की पत्ती

    जबीन-ए-नाज़ का झूमर है फूल सरसों का

    'अरूस-ए-हुस्न का ज़ेवर गुलाब की पत्ती

    नज़ारा देखना है हम को हुस्न-ए-फ़ितरत का

    हटा दो चेहरा-ए-गुल से हिजाब की पत्ती

    है ज़ख़्म-ज़ख़्म में तीर-ए-अदा से गुल-कारी

    सितम-कशों ने यही इंतिख़ाब की पत्ती

    किसी का ग़ुंचा-ए-दिल तो नहीं है यारों में

    मसल-मसल के जो तुम ने ख़राब की पत्ती

    सफ़ेद रीश भी भरते हैं दम जवानी का

    हुई हिना से नुमायाँ ख़िज़ाब की पत्ती

    गुलों के बाद बहारी ने पुतरी खोले

    वरक़-वरक़ है तिलाई किताब की पत्ती

    वतन परस्तों ने पहने हैं केसरी जामे

    कि सब्ज़ है शजर-ए-इंक़िलाब की पत्ती

    शिकस्ता हो गया साज़-ए-वतन में सोज़ नहीं

    उखड़ गई मिरे चंग-ओ-रुबाब की पत्ती

    बसंत आई है रिंदों में बैठ कर 'कैफ़ी'

    हम शरीक हो डालो शराब की पत्ती

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