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ऐ शांती अहिंसा की उड़ती हुई परी

नज़ीर बनारसी

ऐ शांती अहिंसा की उड़ती हुई परी

नज़ीर बनारसी

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    शांती अहिंसा की उड़ती हुई परी

    तू भी कि गई छब्बीस जनवरी

    सर पर बसंत घास ज़मीं पर हरी-हरी

    फूलों से डाली-डाली चमन की भरी-भरी

    आई तू तो सब की सुनूँगा खरी-खरी

    तुझ बिन उदास है मिरी खेती हरी-भरी

    जल्द कि गई छब्बीस जनवरी

    घूँघट उलट रही है चमन की कली-कली

    शाख़ें तो टेढ़ी-मेढ़ी हैं सूरत भली-भली

    रंगीनियाँ हैं बाग़ में ख़ुश्बू गली-गली

    शबनम से है कली की प्याली भरी भरी

    तो भी कि गई छब्बीस जनवरी

    मुस्का रही है मुझ पे मिरे बाग़ की कली

    आँखें दिखा रही है मुझे कल की छोकरी

    ऐसा हो कि फूल उड़ाईं मिरी हँसी

    अब तैरने लगी मिरी आँखों में जल-परी

    जल्द कि गई छब्बीस जनवरी

    काँटे हूँ चाहे फूल हूँ फ़स्ल-ए-बहार के

    पाले हैं दोनों एक ही परवरदिगार के

    हम भारती शिकार हैं अपने ही वार के

    शांती अहिंसा की उड़ती हुई परी

    धरती पे कि गई छब्बीस जनवरी

    स्रोत :
    • पुस्तक : Kulliyat-e-Nazeer Banarasi (पृष्ठ 325)

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