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जाम-ए-जम है कि है ये ताज-ए-सिकंदर गागर

ज़व्वार हुसैन अदील

जाम-ए-जम है कि है ये ताज-ए-सिकंदर गागर

ज़व्वार हुसैन अदील

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    रोचक तथ्य

    خواجہ کڑک ابدال کی درگاہ سے گاگر اٹھ کر دریائے گنگا تک جاتی ہے جو وہاں سے تقریباً ایک میل کے فاصلے پر ہے اور وہاں سے گاگر بھر کر پھر مزار تک گاگر لے جانے میں قوالی گاتے ہوئے گزرتے ہیں اس موقع کے لیے عدیلؔ نے ایک نظم بعنوان گاگر لکھی تھی۔

    जाम-ए-जम है कि है ये ताज-ए-सिकंदर गागर

    पंजतन-ए-पाक का साया है कि सर पर गागर

    हर-घड़ी हर-ज़माँ रटता हूँ मैं गागर-गागर

    दिल में गागर है मिरे मेरी ज़बाँ पर गागर

    भर दिया राज़-ए-इलाही से 'अली ने उस को

    हो गई अब तो हक़ीक़त में समुंदर गागर

    हूरें जन्नत में पुकारें कि मुबारक हो उन्हें

    ख़्वाजा कड़की जो चले सर पे उठा कर गागर

    इस तरह माली ने फूलों से सजाया है उसे

    तुर्बत-ए-ख़्वाजा कड़क पर है गुल-ए-तर गागर

    गर मोहब्बत हो हक़ीक़ी तो हक़ीक़त में 'अदील'

    भर के दें साक़ी-ए-कौसर लब-ए-कौसर गागर

    स्रोत :
    • पुस्तक : sukhanwaran-e-qasaba-e-kada (पृष्ठ 243)

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