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निशाँ बर सफ़्हः-ए-हस्ती नबूवद अज़ ’आलम-ओ-आदम

मख़दूम सादुद्दीन ख़ैराबादी

निशाँ बर सफ़्हः-ए-हस्ती नबूवद अज़ ’आलम-ओ-आदम

मख़दूम सादुद्दीन ख़ैराबादी

MORE BYमख़दूम सादुद्दीन ख़ैराबादी

    निशाँ बर सफ़्हः-ए-हस्ती नबूवद अज़ 'आलम-ओ-आदम

    कि दिल दर मकतब-ए-'इश्क़ अज़ तमन्ना-ए-तू मन बुर्दम

    जब अस्तित्व के पन्ने पर दुनिया का नाम था, इंसान का निशान,

    तब मैं इश्क़ के मदरसे में तेरी चाह से भरा हुआ दिल लेकर गया था।

    कि दारद ईं चुनीं 'इश्क़े कि दर 'इश्क़-ए-तु मन दारम

    शराबम ख़ूँ कबाबम दिल नदीमम दुर्द-ओ-नुक़्लम ग़म

    तेरे इश्क़ में मुझ जैसा सुरूर और दीवानगी किसे मिली है? ख़ून शराब बन गया, दिल कबाब हो गया, दर्द मेरा साथी है और ग़म मेरी इबादत।

    बरो 'अक़्ल-ए-ना-महरम कि इमशब बा-ख़याल-ए-ऊ

    चुनाँ ख़ुश ख़ल्वते दारम कि मन हम नीस्तम महरम

    अक़्ल! आज की रात दूर रह, तू यहाँ परायी है, क्योंकि आज मुझे उस (अज़ली-ओ-अबदी) महबूब के ख़याल में ऐसी मीठी तन्हाई मिली है कि अब मैं ख़ुद भी उस तन्हाई का होश नहीं रखता (यानी पूरी तरह फ़ना हो जाना जिसमें द्वैत का बोध भी बाक़ी रहे)।

    अगर पुरसंद 'साद' अज़ 'इश्क़-ए-ऊ हासिल चहा दारी

    मलामत-हा-ए-गूनागूँ जराहत-हा-ए-बे-मरहम

    और अगर, ‘साद’ लोग पूछें कि उसके इश्क़ में तुम्हें क्या हासिल हुआ?

    तो कह देना, मुझे सिर्फ़ ताने मिले, और ऐसे ज़ख़्म मिले जिनका कोई मरहम नहीं।

    स्रोत :
    • पुस्तक : नग़मातुल उंस फ़ी मजालिसिल क़ुदस (पृष्ठ 246)
    • रचनाकार :शाह हिलाल अहमद क़ादरी
    • प्रकाशन : दारुल एशा'अत ख़ानक़ाह मुजीबिया (2016)
    • संस्करण : First

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