कहानी -3-ख़ामोशी- गुलिस्तान-ए-सा’दी
एक नौजवान बड़ा बुद्धिमान था। उसमें बहुत-से गुण थे लेकिन वह लोगों में अधिक उठना-बैठना पसन्द नहीं करता था।जब आ’लिमों की सभा में बैठता तो ख़ामोश रहता।
एक दिन उसके पिता ने कहा, बेटा, तू भी कुछ बोला कर और अपने इ’ल्म से लोगों को लाभ पहुँचाया कर।
वह बोला, अब्बा जान, मुझे डर है कि कहीं लोग मुझसे ऐसी बातें न पूछ बैठें जो मुझे मा’लूम ही न हों और मुझे शर्मिन्दा होना पड़े।
'क्या तूने नहीं सुना कि एक सूफ़ी अपने जूतों के तले में ख़ुद कीलें ठोकने लगा तो उसे इस काम में माहिर समझकर एक सिपाही ने उसकी बाँह पकड़कर कहा चल मेरे घोड़े की ना’ल ठोक दे।'
'तू बोलता नहीं तब तक तुझसे किसी का कोई सरोकार नहीं। परन्तु जब तू बोलना शुरू’ कर देगा तो जो कुछ कहेगा उसका तुझे प्रमाण भी देना पड़ेगा।
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